राम मंदिर चोरी मामले में भारतीय न्यायपालिका और उच्चतम न्यायालय का कानूनी वजूद भी खतरे में फँसा
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
संविधान के अनुसार भारतीय न्यायपालिका, जिसका प्रमुख केंद्र **उच्चतम न्यायालय** है, उसे लोकतंत्र का स्तंभ होने का अधिकार प्राप्त है। वह भी अब अयोध्या में राम मंदिर की दानपेटी से चोरी व अन्य आर्थिक अपराधों के कारण अपने कानूनी वजूद को खतरे में फँसा चुका है। यह खतरा इतना गंभीर है कि उसके लिए एक तरफ कुआँ और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति बन गई है।
इसी खतरे को लेकर पहले मामले की तत्काल सुनवाई नहीं हुई। अब आज, **13 जुलाई** को सुनवाई की तारीख दी गई है। उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने ही अपने फैसलों से राम मंदिर निर्माण का कानूनी मार्ग प्रशस्त किया था, जो भारतीय संविधान व कानूनों के अनुसार निर्धारित किया गया था। अब इस चोरी की नई सुनवाई में उच्चतम न्यायालय को अपने ही पुराने आदेश की कानूनी वैधता को सच्चाई और वास्तविक जीवन के आधार पर परखना पड़ेगा।
उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर व बाबरी मस्जिद विवाद में **रामलला** को एक जीवित बालक मानते हुए उसे मुकदमे में पक्षकार के रूप में स्वीकार किया था। साथ ही, बालक होने के कारण उसकी ओर से सुनवाई व मुकदमा लड़ने के लिए अन्य लोगों को कानूनी मान्यता दी थी।
अब उच्चतम न्यायालय के सामने सबसे पहला और बड़ा सवाल यह होगा कि इतने वर्षों बाद वह रामलला को अब भी बालक मानेगा या संविधान के अनुसार समय की गतिशीलता के आधार पर उसे प्रौढ़ मानेगा। इसके बाद मामला दानपेटी में हुई चोरी का आएगा। यह दानपेटी प्रौढ़ राम के निवास स्थान में, उनके सामने या निकट रखी थी। इसलिए अदालती आदेश के अनुसार, यदि उन्हें जीवित माना जाता है, तो उन्होंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा होगा।
अदालत व पुलिस में शिकायत प्रौढ़ राम ने नहीं की। इसलिए क्या अदालत उन्हें बयान देने के लिए बुलाएगी, या संविधान के अनुसार आम लोगों की तरह प्रौढ़ राम को चोरी में संलिप्तता के संदेह के आधार पर जेल भेजेगी? वहाँ से पुलिस रिमांड लेकर पूछताछ करेगी। इसके अलावा, राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा जमीन खरीद में दान की राशि से कई गुना अधिक मूल्य देकर करोड़ों रुपये के घोटाले के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। राम जन्मभूमि ट्रस्ट में जीवित रामलला की क्या भूमिका या सहमति है, यह भी स्पष्ट करना होगा, क्योंकि आम जनता ने पैसा, हीरे, सोना, चाँदी, आभूषण आदि रामलला को समर्पित किए हैं।
अब विज्ञान के तर्क तथा आधुनिक संवैधानिक और न्यायिक भाषा में जीवित भगवान राम, जिन्हें सृष्टि का स्वामी और भगवान माना जाता है, क्या इतने कमजोर, दयनीय, गरीब और लाचार हैं कि वे अपने सामने दानपेटी रखकर बैठते हैं, जैसे कोई भिखारी कटोरा लेकर बैठता है, ताकि लोग उसकी लाचारी, विवशता, दयनीयता और दरिद्रता देखकर उसके जीवन-यापन के लिए उस दानपेटी में धन डालें? इस प्रकार के हजारों प्रश्न अदालत के निर्णय और प्रत्येक कार्यवाही के इर्द-गिर्द मंडराएँगे। अब अदालत ही बताएगी कि "राम का नाम सत्य है" के पीछे कितनी सच्चाई, छल या कपट छिपा है।
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