‘भारत में संसद नहीं, संविधान सर्वोच्च’, पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई का बड़ा बयान
भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा है कि भारतीय लोकतंत्र में किसी भी संस्था को निरंकुश सर्वोच्चता प्राप्त नहीं है और देश में संविधान ही सर्वोच्च सत्ता का स्रोत है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न संसद, न कार्यपालिका और न ही न्यायपालिका सर्वोच्च है, बल्कि सभी संस्थाएं संविधान की सीमाओं और मर्यादाओं के भीतर काम करती हैं।
श्रीलंका के कोलंबो विश्वविद्यालय में आयोजित 19वें सुजाता जयरवर्धने स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति बीआर गवई ने भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक लोकतंत्र किसी एक शक्ति केंद्र के इर्द-गिर्द संचालित नहीं होता, बल्कि यह संतुलन, जवाबदेही और सीमित अधिकारों की व्यवस्था पर आधारित होता है।
पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय संविधान ने संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का संतुलन स्थापित किया है। उन्होंने कहा कि समय-समय पर संसद और न्यायपालिका के बीच मतभेद और टकराव की स्थितियां भी बनीं, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को और मजबूत किया।
न्यायमूर्ति गवई ने कहा, “भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में संसद किसी भी पूर्ण अर्थ में सर्वोच्च नहीं है। न कार्यपालिका सर्वोच्च है और न ही न्यायपालिका। संविधान ही एकमात्र सर्वोच्च सत्ता है, जिससे सभी संस्थाओं को अधिकार प्राप्त होते हैं और सभी उसी की सीमाओं से बंधी हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है, जब सभी संस्थाएं अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों की संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करें। पूर्व प्रधान न्यायाधीश के इस बयान को संवैधानिक संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी माना जा रहा है।
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