भारत की कृषि संकट में फंसी: MSP के दावे और सरकारी आंकड़े केवल कागज़ो तक सीमित 

Oct 20, 2025 - 11:37
Oct 20, 2025 - 11:38
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भारत की कृषि संकट में फंसी: MSP के दावे और सरकारी आंकड़े केवल कागज़ो तक सीमित 

नई दिल्ली (आरएनआई) भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान लगभग 16% है और आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 3.7% रही। केंद्रीय बजट में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपये का आवंटन यह दर्शाता है कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सब कुछ ठीक है।लेकिन किसानों की जमीन पर हालत इससे बिल्कुल अलग है। धान, गेहूँ और अन्य फसलों के किसान MSP (Minimum Support Price) पर अपनी उपज बेचने के लिए उम्मीद लगाए रहते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्हें धान प्रति क्विंटल 1,100-1,200 रुपये में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि उत्पादन लागत इससे कई गुना अधिक है। खाद और बीज की किल्लत, आवारा पशु नुकसान, बाढ़, अनियमित बारिश और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं किसानों की परेशानियों को और बढ़ा रही हैं।

कृषि क्षेत्र रोजगार का बड़ा स्तंभ है। देश में औसतन 56.4 करोड़ लोग (15 वर्ष और उससे अधिक आयु) कार्यरत हैं, जिनमें से 39.7 करोड़ पुरुष और 16.7 करोड़ महिलाएँ हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश लोग कृषि कार्यों से जुड़े हैं — 44.6% पुरुष और 70.9% महिलाएँ सीधे कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में कार्यरत हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि ग्रामीण रोज़ी-रोटी और जीवन-यापन के लिए कृषि पर निर्भर है, जबकि शहरी क्षेत्रों में तृतीयक क्षेत्र रोजगार का मुख्य स्रोत है।

महिला श्रमिकों की भागीदारी 2017-18 के 57% से बढ़कर 2023-24 में 64.4% हो गई है, यह दिखाता है कि अधिक परिवारों की रोज़ी-रोटी सीधे कृषि पर निर्भर हो गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को केवल ब्यूरोक्रेटिक आंकड़ों पर भरोसा करने की बजाय जमीन पर व्यापक सर्वेक्षण करना चाहिए, ताकि वास्तविक उत्पादन, लागत, बिक्री मूल्य और किसानों की समस्याओं का सही आंकलन किया जा सके। सरकारी तंत्र केवल कागज़ी रिपोर्टिंग और “अल इज़ वेल” दिखाने में व्यस्त है, जबकि किसान अपने खेतों में उपज की सुरक्षा और बिक्री के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कृषि क्षेत्र की सच्चाई यही है कि कागज़ी आंकड़ों से किसान का भला नहीं होगा। MSP, कृषि बीमा, सब्सिडी और आपदा राहत जैसी योजनाएं तभी प्रभावी होंगी, जब जमीन पर जाकर किसानों की वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखा जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जमीनी सर्वेक्षण और वास्तविक आंकड़ों पर आधारित नीतियां नहीं बनाई गईं, तो आने वाले समय में किसान और अधिक संकट में पड़ सकते हैं। उनका कहना है कि किसानों के आर्थिक दबाव, प्राकृतिक आपदाओं और बाजार असमानताओं के बीच उनकी हालत और गंभीर होती जा रही है।

भारत की कृषि व्यवस्था आज गंभीर संकट में है। सरकारी आंकड़े और कागज़ी योजनाएं केवल रिपोर्टों तक सीमित हैं, जबकि किसान खेतों में बर्बादी, लागत बढ़ने और उपज का उचित मूल्य न मिलने की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। असली सुधार तभी संभव है जब सरकार जमीन पर जाकर किसानों की वास्तविक समस्याओं का आंकलन करे और उसी आधार पर नीतियां बनाए।

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Laxmi Kant Pathak Senior Journalist | State Secretary, U.P. Working Journalists Union (Regd.)