महाकाल मंदिर में वीआईपी दर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार, याचिका खारिज
नई दिल्ली (आरएनआई) — सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी दर्शन की अनुमति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मंदिर प्रबंधन से जुड़े धार्मिक और परंपरागत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं हैं और ऐसे विषयों का निर्णय संबंधित मंदिर प्राधिकरण को ही करना चाहिए।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ ने टिप्पणी की कि गर्भगृह जैसे अत्यंत पवित्र धार्मिक स्थल पर मौलिक अधिकारों को सीधे लागू करने के “अनपेक्षित परिणाम” हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि यदि समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) को उस रूप में लागू किया जाए, तो अन्य मौलिक अधिकारों के दावे भी उठ सकते हैं, जिससे धार्मिक व्यवस्था और परंपराओं पर असर पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि गर्भगृह में प्रवेश के मामले में नागरिकों के साथ वीआईपी और आम भक्त के रूप में भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि यदि कुछ लोगों को प्रशासनिक सिफारिश पर प्रवेश दिया जाता है, तो समान अवसर अन्य भक्तों को भी मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी दलील दी कि या तो सभी के लिए समान रूप से प्रवेश की व्यवस्था हो या फिर पूरी तरह प्रतिबंध हो।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर कोई दिशानिर्देश जारी करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को संबंधित मंदिर प्राधिकरण के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दे दी। इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
इस याचिका में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें वीआईपी दर्शन के खिलाफ दायर याचिका पहले ही खारिज की जा चुकी थी। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ‘वीआईपी’ की कोई विधिक परिभाषा नहीं है और यह मंदिर प्रबंधन तथा जिला प्रशासन के विवेक का विषय है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि धार्मिक स्थलों के आंतरिक प्रबंधन से जुड़े मामलों में अदालतें सीमित दायरे में ही दखल देंगी, और प्राथमिक निर्णय लेने का अधिकार संबंधित धार्मिक संस्थाओं के पास ही रहेगा।
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