मुंबई (आरएनआई) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने सरसंघचालक के पद को लेकर बड़ा और स्पष्ट बयान दिया है। उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक किसी विशेष जाति का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि वह केवल हिंदू होता है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस पद के लिए जाति कोई मापदंड नहीं है।
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि सरसंघचालक न तो ब्राह्मण होता है, न क्षत्रिय और न ही किसी अन्य जाति के रूप में उसकी पहचान की जाती है। संघ में इस पद के लिए चयन पूरी तरह से विचार, आचरण और संगठन के प्रति समर्पण के आधार पर होता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ जातिगत पहचान से ऊपर उठकर काम करता है और सरसंघचालक का दायित्व पूरे हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करना होता है।
आरएसएस प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि संघ के शीर्ष पद पर वही व्यक्ति आसीन होता है, जो हिंदू समाज की एकता, संस्कार और मूल्यों को आत्मसात करता हो। जाति के आधार पर पद का निर्धारण संघ की परंपरा और विचारधारा के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि उसे जातियों में बांटना।
मोहन भागवत के इस बयान को सामाजिक समरसता और संघ की मूल सोच के संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें जाति से ऊपर उठकर हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया गया है।