मंत्र, यंत्र और तंत्र: आध्यात्मिक साधना के तीन रहस्यमय स्तंभ
कादीपुर (आरएनआई) धार्मिक परंपराओं में मंत्र, यंत्र और तंत्र को साधना के तीन प्रमुख आधार माना गया है। तीनों ही साधनाएँ अलग होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ी हैं और मिलकर साधक को आध्यात्मिक विकास, मानसिक शांति और चेतना के विस्तार की ओर ले जाती हैं।
आध्यात्मिक पथ पर साधना के तीन प्रमुख साधन माने जाते हैं – मंत्र, यंत्र और तंत्र।
मंत्र जहां ध्वनि आधारित शक्ति है, वहीं यंत्र ज्यामितीय प्रतीकात्मक ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। तंत्र एक विधि है, जिसके माध्यम से साधक अपने शरीर, मन और ऊर्जा को साधकर चेतना के विस्तार का मार्ग खोजता है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
मंत्र: ध्वनि या शब्द द्वारा ईश्वर व ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ाव।
यंत्र: दृश्य प्रतीक, ज्यामितीय आकृति और ऊर्जा का केंद्र।
तंत्र: साधना की वह संपूर्ण प्रणाली जो मंत्र और यंत्र दोनों के साथ कार्य करती है।
हालांकि, आम जनमानस में तंत्र को लेकर भ्रांतियां अधिक हैं। तंत्र का नाम आते ही लोगों के मन में ओझा, काला जादू, श्मशान साधना और नकारात्मक छवियाँ कौंध जाती हैं। जबकि विद्वानों का मानना है कि “तंत्र डरने का विषय नहीं, बल्कि समझने का विषय है।”
वेदों में तंत्र विद्या का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद तक में इसके सूत्र निहित हैं। जानकारों का कहना है कि तंत्र का उद्देश्य किसी का अहित करना नहीं, बल्कि कल्याण और चेतना का उत्थान है।
तंत्र का दुरुपयोग और पतन
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में कई छोटे ओझा और कथित तांत्रिक तंत्र का दुरुपयोग कर समाज में भय फैलाते हैं। ऐसे लोग तंत्र साधना का उपयोग स्वार्थ या नुकसान पहुँचाने में करते हैं। किंतु तंत्र विद्या का वास्तविक स्वरूप सात्विक है और इसका सही प्रयोग समाज हित में होना चाहिए।
सिद्धि और साधना का विज्ञान
तंत्र को किसी साधारण समय में नहीं, बल्कि विशेष अवसर, नक्षत्र और घड़ियों में साधना के बाद ही सिद्ध किया जा सकता है। विद्या सिद्ध करने के लिए कठिन तपस्या की आवश्यकता होती है। विद्या सिद्ध होने के बाद साधक इसका उपयोग करता है।
तंत्र साधना दो प्रकार की बताई जाती है – सात्विक तंत्र: जहां साधक भगवान की साधना और ध्यान के माध्यम से साधना करता है।
तामस तंत्र: जहां बलि, श्मशान साधना या अन्य क्रियाओं द्वारा सिद्धि प्राप्त की जाती है।
तंत्र, मंत्र और यंत्र – तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए साधन हैं। मंत्र ध्वनि से, यंत्र आकृति से और तंत्र साधना से साधक को ईश्वर से जोड़ते हैं। लेकिन गलतफहमियों और दुरुपयोग के कारण तंत्र को ‘भय’ का विषय बना दिया गया है, जबकि इसकी वास्तविकता सात्विक, गूढ़ और कल्याणकारी है।
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