बिहार में गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण 2025 पर सियासी विवाद, चुनाव आयोग पर उठे सवाल
बिहार में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण 2025 को लेकर राजनीतिक पारा चढ़ चुका है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने इस अभियान को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया भ्रम, असमंजस और एकतरफा राजनीतिक हितों से संचालित हो रही है।
पटना (आरएनआई) बिहार में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण 2025 को लेकर राजनीतिक पारा चढ़ चुका है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने इस अभियान को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया भ्रम, असमंजस और एकतरफा राजनीतिक हितों से संचालित हो रही है।
तेजस्वी यादव का कहना है कि 27 जून को हुई उनकी प्रेस कांफ्रेंस के बाद से अब तक आयोग ने कई बार अपने ही दिशा-निर्देशों में बदलाव किए हैं। कभी पात्रता तिथि बदली गई, कभी दस्तावेजों की प्रकृति, तो कभी प्रक्रिया की समय-सीमा। यह दर्शाता है कि खुद आयोग को ही स्पष्ट नहीं है कि वह करना क्या चाहता है। तेजस्वी ने यह भी पूछा कि क्या इस पूरी योजना की जानकारी किसी राजनीतिक दल को पहले से थी? क्या कोई सर्वदलीय बैठक हुई? या यह सब एक गुप्त और एकतरफा "चुनावी सफाई" का हिस्सा है?
चुनाव आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि पिछले बार गहन मतदाता पुनरीक्षण 2003 में हुआ था। तब से अब तक राज्य में शहरीकरण, सूचना अद्यतन में देरी और फर्जी नागरिकों के नाम सूची में शामिल होने जैसी समस्याएं सामने आईं। इन्हीं कारणों से 1 जुलाई 2025 की अर्हता तिथि के आधार पर यह विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाया जा रहा है।
लेकिन राजद सवाल उठा रही है कि यदि ये समस्याएं इतनी गंभीर थीं, तो यह अभियान एक-दो साल पहले क्यों नहीं शुरू किया गया? अब जब बिहार विधानसभा चुनाव महज चार महीने दूर हैं, तो सिर्फ 25 दिन के भीतर पूरे राज्य में गहन पुनरीक्षण कैसे संभव है?
सबसे बड़ा सवाल आयोग के उस नियम पर है जिसके अनुसार बीएलओ (BLO) तीन बार मतदाता के घर जाएगा और यदि तय पते पर मतदाता नहीं मिला, तो उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा। आयोग की ओर से मतदाताओं के भौतिक सत्यापन को अनिवार्य कर दिया गया है। तेजस्वी का कहना है कि यह नियम सीधे-सीधे उन लाखों गरीब मजदूरों, प्रवासियों और कामकाजी वर्गों के खिलाफ है जो रोज़ी-रोटी के लिए राज्य से बाहर रहते हैं। चुनाव के समय वे अपने गांव लौटते हैं, मतदान करते हैं और फिर वापस काम पर चले जाते हैं। लेकिन इस भौतिक सत्यापन प्रक्रिया में वे अपने नाम से वंचित हो जाएंगे, बिना किसी सूचना और बिना कागज दिखाने के मौके के।
इसके अलावा आयोग ने 02 दिसंबर 2004 के बाद के मतदाताओं के लिए यह भी निर्देश जारी किया है कि उन्हें अपने साथ-साथ अपने माता-पिता दोनों के पहचान पत्र भी देने होंगे। जबकि पहचान पत्र के रूप में आधार कार्ड और राशन कार्ड को मान्य नहीं माना गया है। आयोग ने 11 दस्तावेजों की एक सूची जारी की है, जिनमें से किसी एक को प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
तेजस्वी ने सरकार और आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि इन दस्तावेजों का बिहार की कुल जनसंख्या में कितना प्रतिशत है? क्या यह संभव है कि राज्य के गरीब, ग्रामीण और वंचित समुदायों के पास पासपोर्ट, सरकारी पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र या भूमि आवंटन पत्र हों?
तेजस्वी ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में बने रहने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की फोटोकॉपी हर घर में मौजूद नहीं होती, और अब BLO के आने पर उनके पास रंगीन फोटो भी व्हाइट बैकग्राउंड के साथ मौजूद होना चाहिए। उन्होंने पूछा, क्या किसी आम परिवार के पास घर के हर सदस्य की ऐसी फोटो रहती है? यह व्यवस्था कितनी यथार्थपरक है?
इस बीच आयोग की ओर से तय की गई समयरेखा के अनुसार 26 जुलाई तक सभी घरों में गणना फॉर्म बांटने, भरवाने और सत्यापन का कार्य पूरा करना है। लेकिन अब तक 99.99 प्रतिशत जगहों पर प्रक्रिया शुरू तक नहीं हुई है। मानसून की शुरुआत हो चुकी है, नदियों का जलस्तर बढ़ रहा है और बिहार का 73 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में आता है। यही इलाके गरीब, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक आबादी के ठिकाने हैं। राजद का आरोप है कि यह विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान वास्तव में एक साजिश है, ताकि इन तबकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकें।
तेजस्वी ने आरोप लगाया कि आयोग एकतरफा सूत्रों के हवाले से बयान जारी करता है, और खुद मुख्य चुनाव आयुक्त इस गंभीर विषय पर सामने आकर जनता को जवाब नहीं दे रहे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “वो Mr. India क्यों बने हुए हैं? अगर मंशा साफ है तो हमारे सवालों का बिंदुवार जवाब क्यों नहीं दिया जाता?”
राजद का दावा है कि बिहार के 90 प्रतिशत लोग मानते हैं कि आयोग ने इस प्रक्रिया के ज़रिए बीजेपी और जेडीयू के निर्देश पर विपक्ष के मजबूत बूथों की पहचान कर पहले से ही तय कर लिया है कि कहाँ से कितने वोट काटने हैं और कहाँ जोड़ने हैं। हालांकि राजद ने यह भी कहा कि वे सतर्क हैं, उनके पास 2014 और 2024 की मतदाता सूची की प्रतियां हैं और वे किसी भी छेड़छाड़ को उजागर करने को तैयार हैं।
तेजस्वी यादव ने अंत में कहा कि यह केवल मतदाता सूची में नाम बनाए रखने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र और वजूद की लड़ाई है। बिहार लोकतंत्र की जननी है, और हम इसे किसी भी कीमत पर नष्ट नहीं होने देंगे, चाहे इसके लिए जेल ही क्यों न जाना पड़े।
राजद की मांगें हैं कि चुनाव आयोग सभी भ्रमित आदेशों को रद्द करे और एक अंतिम, स्पष्ट, सरल निर्देश जारी करे। 2003 की मतदाता सूची को आधार मानने की प्रक्रिया को समाप्त किया जाए। दस्तावेजों की अनिवार्यता को समाप्त किया जाए या उसके व्यावहारिक और सुलभ विकल्प अपनाए जाएं। एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से दोबारा नियोजित किया जाए। साथ ही इस मामले की न्यायिक निगरानी या संसदीय जांच कराई जाए।
तेजस्वी ने कहा, यह केवल नाम की लड़ाई नहीं है, यह लोकतांत्रिक भागीदारी और संविधान में विश्वास रखने वाले करोड़ों लोगों के अस्तित्व की लड़ाई है। हम यह नहीं होने देंगे कि प्रक्रिया के नाम पर किसी वर्ग विशेष को लोकतंत्र से बाहर कर दिया जाए। लोकतंत्र सबका है, कुछ चुनिंदा लोगों का नहीं।
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