बार-बार कर्ज मांगने पर शर्मिंदगी, पीएम शहबाज बोले— ‘मदद मिली, लेकिन आत्मसम्मान को लगी ठेस’

Jan 31, 2026 - 11:58
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बार-बार कर्ज मांगने पर शर्मिंदगी, पीएम शहबाज बोले— ‘मदद मिली, लेकिन आत्मसम्मान को लगी ठेस’

इस्लामाबाद (आरएनआई) पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश की आर्थिक बदहाली को लेकर एक बार फिर खुलकर बयान दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि बार-बार कर्ज मांगना उनके लिए व्यक्तिगत रूप से शर्मिंदगी भरा अनुभव रहा है और इससे देश के आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंची है।

हाल ही में कारोबारियों और निर्यातकों को संबोधित करते हुए शरीफ ने कहा कि जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहे थे और अंतरराष्ट्रीय भुगतान का दबाव बढ़ता जा रहा था। ऐसे हालात में देश को अपने मित्र राष्ट्रों से वित्तीय मदद मांगनी पड़ी। उन्होंने खुलासा किया कि इस कठिन दौर में उन्होंने और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने चुपचाप कई देशों का दौरा किया और अरबों डॉलर के कर्ज की अपील की, ताकि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से राहत पैकेज मिल सके और वित्तीय कमी को पूरा किया जा सके।

प्रधानमंत्री ने कहा कि कर्ज लेना कभी आसान नहीं होता। जब कोई देश मदद मांगता है तो उसे कई शर्तों और दबावों का सामना करना पड़ता है। कई बार ये शर्तें ऐसी होती हैं जिनका स्पष्ट औचित्य भी नजर नहीं आता, लेकिन मजबूरी में उन्हें मानना पड़ता है। शरीफ ने माना कि इस प्रक्रिया में देश को समझौते करने पड़ते हैं, जो राष्ट्रीय सम्मान के लिए पीड़ादायक होते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि कठिन समय में कई मित्र देशों ने पाकिस्तान की मदद की, जिनमें चीन की भूमिका सबसे प्रमुख रही। शरीफ ने इन देशों के प्रति आभार जताया, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि कर्ज की इस व्यवस्था की एक बड़ी कीमत होती है, और वह है राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर असर।

प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने इस मुद्दे पर अपनी भावनाएं व्यक्त की हों। इससे पहले भी वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि बार-बार कर्ज मांगना उन्हें शर्मिंदा करता है, खासकर तब जब पारंपरिक मित्र देश लगातार पाकिस्तान की मदद करते रहे हैं।

अपने संबोधन के अंत में शहबाज शरीफ ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान का लक्ष्य आत्मनिर्भर बनना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को आईएमएफ कार्यक्रमों पर निर्भर रहने की नीति से बाहर निकलकर आर्थिक सुधार, निर्यात वृद्धि और घरेलू संसाधनों के बेहतर उपयोग पर ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए।

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