जब नवाचारों से ही चुभने लगी प्रगति: राष्ट्रपति सचिवालय पर उठे सवाल
(शैलेंद्र बिरानी)
नई दिल्ली (आरएनआई) देश की बौद्धिक संपदा और नवाचार को सम्मानित करने वाले नेशनल आईपी अवार्ड 2025 की घोषणा के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। राष्ट्रपति सचिवालय पर यह गंभीर आरोप लगा है कि वह देश की प्रगति और वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति उदासीनता, बल्कि विरोध का रवैया अपनाए हुए है।
जानकारी के अनुसार, इस वर्ष के नेशनल आईपी अवार्ड 2025 के लिए नामांकित एक प्रमुख वैज्ञानिक ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति सचिवालय ने न केवल उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों की अनदेखी की, बल्कि देश के विकास से जुड़ी परियोजनाओं में भी अड़चनें खड़ी कीं।
संबंधित वैज्ञानिक ने बताया कि वर्ष 2005 से 2011 तक उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति सचिवालय और कई केंद्रीय एजेंसियों को देशहित से जुड़े कई नवाचारों की जानकारी भेजी थी। इसके बावजूद उनकी उपलब्धियों को बार-बार नज़रअंदाज़ किया गया।
उन्होंने कहा कि "मेरी कई तकनीकी और नवोन्मेषी परियोजनाओं को पहले प्रधानमंत्री कार्यालय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से सराहना मिली थी, लेकिन राष्ट्रपति सचिवालय ने किसी भी स्तर पर सहयोग नहीं दिया।"
यह भी उल्लेखनीय है कि 13 मई 2009 को प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित एक आधिकारिक ईमेल में उनकी परियोजना को “राष्ट्रहित में उत्कृष्ट पहल” बताया गया था। इसके बावजूद राष्ट्रपति सचिवालय से लगातार टालमटोल और चुप्पी बनी रही।
इस मुद्दे पर संबंधित वैज्ञानिक ने टीआईएफएसी (TIFAC) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय को कई बार पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने राष्ट्रपति सचिवालय की भूमिका पर सवाल उठाए। 16 अक्टूबर 2025 को जारी एक पत्र में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि “यदि देश की सर्वोच्च संस्थाएँ ही नवाचारों का सम्मान नहीं करेंगी, तो वैज्ञानिकों का मनोबल कैसे बढ़ेगा?”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्षों से राष्ट्रपति सचिवालय ऐसे अनेक नवोन्मेषी कार्यों और परियोजनाओं को रोकता रहा है जो भारत की आर्थिक और वैज्ञानिक उन्नति में सहायक हो सकते थे।
अंत में उन्होंने अपील की है कि भारत सरकार इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराए और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी सरकारी संस्था के रवैये से देश की प्रगति पर अंकुश न लगे।
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