सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राष्ट्रपति और राज्यपाल पर बिल मंजूरी की समयसीमा तय नहीं कर सकती अदालत

Nov 20, 2025 - 15:27
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राष्ट्रपति और राज्यपाल पर बिल मंजूरी की समयसीमा तय नहीं कर सकती अदालत

नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अदालत राज्य विधानसभा से पारित बिलों को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं कर सकती। यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर सुनाया गया, जिसमें 14 प्रश्न सुप्रीम कोर्ट से राय के लिए भेजे गए थे।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों ही संवैधानिक पद हैं, और बिलों पर निर्णय लेना उनके संवैधानिक कर्तव्यों में शामिल है। ऐसे में न्यायपालिका इस प्रक्रिया पर समयसीमा थोपकर हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी माना कि बिलों पर अत्यधिक देरी लोकतांत्रिक शासन की भावना के प्रतिकूल है, इसलिए अपेक्षा है कि निर्णय ‘उचित समय’ के भीतर लिए जाएं। हालांकि, यह समयसीमा क्या होगी, इसका निर्धारण कोर्ट या न्यायपालिका नहीं करेगी।

यह पूरा मामला तब उठा जब राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा कि क्या न्यायालय यह तय कर सकता है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति को किसी बिल पर कितने समय के अंदर निर्णय लेना चाहिए। राष्ट्रपति ने अपने संदर्भ में 14 सवाल रखे थे, जिनमें जांच यह थी कि बिलों पर मंजूरी, रोक, वापस भेजने या अनुच्छेद 200 और 201 के तहत विचार करने की प्रक्रियाएं न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती हैं या नहीं।

संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि विधायी प्रक्रिया और संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिकाएं संघीय ढांचे और शक्तियों के पृथक्करण से जुड़ी हैं। इसलिए यह कहना संभव नहीं कि न्यायपालिका इस प्रक्रिया में समय-निर्धारण जैसे दखल दे।

11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखने से पहले इस मामले पर 10 दिनों तक दलीलें चलीं। फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया कि अदालतें राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय लेने का तरीका तो नहीं बता सकतीं, लेकिन यह जरूर कह सकती हैं कि अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।

इस फैसले ने अप्रैल में आए उस ऐतिहासिक निर्णय पर भी स्पष्टता प्रदान की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मामले में पहली बार कहा था कि राष्ट्रपति तीन महीने के अंदर निर्णय ले सकती हैं। नया निर्णय यह बताता है कि वह टिप्पणी एक ‘विशेष परिस्थिति’ थी, और इसे सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं माना जाएगा।

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