शुभ योग में शुरू हुआ शारदीय नवरात्रि पर्व, जानें पूजा विधि व कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

Sep 22, 2025 - 10:21
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शुभ योग में शुरू हुआ शारदीय नवरात्रि पर्व, जानें पूजा विधि व कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

नई दिल्ली (आरएनआई) आश्विन मास की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि शुरू होते हैं। इस बार शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर सोमवार से शुरू हो रहे हैं। इस वर्ष देवी दुर्गा का आगमन हाथी पर हो रहा है, जो सुख-समृद्धि, राष्ट्र उन्नति और कल्याण का प्रतीक है। इसके अलावा इस तिथि पर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और हस्त नक्षत्र योग का संयोग बन रहा है।

अगर पूरी सावधानी के बावजूद ज्योति बुझ जाए, तो घबराएं नहीं। तुरंत देवी से क्षमा-प्रार्थना करते हुए और उनके मंत्रों का जाप करते हुए ज्योति को दोबारा जला दें। याद रखें कि इस साधना में आपकी श्रद्धा और भावना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। सच्ची निष्ठा से की गई पूजा को देवी अवश्य स्वीकार करती हैं।

शास्त्रों के अनुसार, नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है और मां भगवती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस ज्योति के प्रकाश से परिवार के सदस्यों को आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। यह परिवार की सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोषों को भी समाप्त करती है।

पूजा सामग्री
मिट्टी, मिट्टी का घड़ा, मिट्टी का ढक्कन, कलावा, जटा वाला नारियल,
जल, गंगाजल, लाल रंग का कपड़ा, एक मिट्टी का दीपक,
बंदनवार, पान, सुपारी,
बताशा, लाल रंग का कपड़ा,
फूल, घी, फूल माला, आम के पत्ते, पंचमेवा
पूजा की थाली, दीपक,
हल्दी, मौली, रोली, कमलगट्टा,
शहद, शक्कर, नैवेध,
नारियल जटा वाला, सूखा नारियल,
दूध, वस्त्र, दही, लौंग, मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर

इस साल शारदीय नवरात्रि 9 नहीं, 10 दिन की होगी। नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू होगी। तृतीया तिथि का व्रत 24 और 25 सितंबर को रखा जाएगा। इस बार तृतीया तिथि दो दिन रहेगी, जिससे शारदीय नवरात्रि में एक दिन की वृद्धि होगी। नवरात्रि में बढ़ती तिथि को शुभ माना जाता है, जबकि घटती तिथि को अशुभ, नवरात्रि में बढ़ती तिथि शक्ति, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।

मां शैलपुत्री की आराधना का मंत्र
पूजन के दौरान इस मंत्र का जाप करने से मां शैलपुत्री की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः।

माता शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है। पूर्व जन्म में वे राजा दक्ष की कन्या सती थीं, जिन्होंने भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में शिव का अपमान देख सती ने आत्मदाह कर लिया। इसके बाद भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ ध्वस्त कर दिया और सती के शरीर को लेकर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 अंग विभक्त किए, जो शक्तिपीठ कहलाए। इसके उपरांत सती ने हिमालय के घर जन्म लेकर शैलपुत्री के रूप में अवतार लिया।

स्नान-ध्यान कर शुभ मुहूर्त में पूजा प्रारंभ करें। कलश स्थापना के बाद एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर अक्षत रखें और उस पर मां शैलपुत्री का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। गंगाजल से उनका अभिषेक करें। लाल वस्त्र, लाल फूल, लाल चंदन और लाल फल अर्पित करना विशेष रूप से फलदायी माना गया है। अंत में माता की आरती कर प्रसन्न करें।

आदिशक्ति की उपासना का पावन पर्व नवरात्रि 22  सितंबर से आरंभ होने जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा का विधान है। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां दुर्गा की साधना भक्तों को शक्ति और आत्मबल प्रदान करती हैं।

मां शैलपुत्री की आराधना करने से सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और साधक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

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