ढाका : चुनाव से पहले सियासत तेज, जमात-ए-इस्लामी ने देशवासियों से मांगी माफी — राजनीतिक गलियारों में मचा हलचल

Nov 4, 2025 - 15:28
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ढाका : चुनाव से पहले सियासत तेज, जमात-ए-इस्लामी ने देशवासियों से मांगी माफी — राजनीतिक गलियारों में मचा हलचल

ढाका (आरएनआई)। बांग्लादेश में फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने अपनी साख सुधारने की कवायद तेज कर दी है। इसी क्रम में जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) के अमीर शफीकुर रहमान ने पार्टी की ‘पुरानी गलतियों’ के लिए देशवासियों से बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि उनकी पार्टी अब नई शुरुआत करना चाहती है।

शफीकुर रहमान ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा, “1947 से अब तक, जिन-जिन लोगों को हमारी वजह से किसी भी तरह की पीड़ा या नुकसान हुआ है, हम उनसे दिल से माफी मांगते हैं। यह माफी किसी एक घटना या समय के लिए नहीं, बल्कि उन सभी क्षणों के लिए है जब किसी को हमारी वजह से दुख पहुंचा।”

हालांकि, रहमान की इस माफी ने बांग्लादेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह माफी पार्टी की छवि सुधारने और आगामी चुनावों से पहले जनता के बीच विश्वास बहाल करने की कोशिश है। वहीं, विपक्षी दलों और कुछ बुद्धिजीवियों ने इसे “अधूरी और अस्पष्ट” बताते हुए सवाल उठाए हैं कि जमात ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए अपराधों का सीधा उल्लेख क्यों नहीं किया।

1971 का काला अध्याय फिर चर्चा में
बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जमात-ए-इस्लामी पर पाकिस्तान का साथ देने और ‘अल-बदर’, ‘अल-शम्स’ व ‘रजाकार’ जैसे अर्धसैनिक संगठनों के माध्यम से नरसंहारों में भूमिका निभाने के गंभीर आरोप लगे थे। इन घटनाओं की यादें अब भी देश की सामूहिक चेतना में गहराई से दर्ज हैं।

रहमान ने कहा कि यह माफी पहली बार नहीं मांगी गई है। उनके अनुसार, “हमारे पूर्व नेता प्रोफेसर गुलाम आजम और मौलाना मतीउर रहमान भी पहले माफी मांग चुके हैं। मैं खुद भी पहले कई बार माफी मांग चुका हूं। यह हमारी ईमानदार कोशिश है कि हम अपनी गलतियों से सबक लें और देश की सेवा करें।”

हसीना सरकार के पतन के बाद बदली सियासी दिशा
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद जमात-ए-इस्लामी पर से प्रतिबंध हटा लिया गया था। इसके बाद से पार्टी ने फिर से राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी है — छात्र संघ चुनावों में हिस्सा लेना, इस्लामी संगठनों से गठबंधन बनाना और सार्वजनिक सभाओं का आयोजन इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

‘माफी चुनावी रणनीति’ बताई जा रही
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम जमात की राजनीतिक पुनर्वापसी की कोशिश है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 1971 के जख्म आज भी लोगों के दिलों में ताजा हैं, ऐसे में जमात की साख बहाल करना आसान नहीं होगा।

आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए शफीकुर रहमान ने कहा, “मैंने बिना शर्त माफी मांगी है। अगर कोई कहे कि माफी का तरीका सही नहीं था, तो मैं पूछता हूं — इससे आगे क्या कहा जा सकता है? जो पार्टी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करती, जनता उसे कभी माफ नहीं करती।”

विश्लेषकों का कहना है कि जमात की यह ‘माफी राजनीति’ एक ओर पार्टी के पुनर्वास की कोशिश है, तो दूसरी ओर यह बांग्लादेश की सियासत में एक नए समीकरण की शुरुआत का संकेत भी दे रही है।

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