अघोरी और नागा साधु: रहस्यमयी तपस्या और जीवन दर्शन की दो धारा

Sep 14, 2025 - 19:41
 0  1.2k
अघोरी और नागा साधु: रहस्यमयी तपस्या और जीवन दर्शन की दो धारा

कादीपुर (आरएनआई) भारत की आध्यात्मिक परंपराओं में साधु-संतों का विशेष महत्व है। इन्हीं परंपराओं में दो पंथ सबसे अधिक चर्चा में रहते हैं – अघोरी साधु और नागा साधु। देखने में दोनों साधु समान प्रतीत होते हैं, लेकिन उनकी साधना, रहन-सहन, नियम और दर्शन में बड़ा अंतर है।

अघोरी साधु – श्मशान साधना और रहस्यमयी तप

अघोरी साधु अघोर पंथ के अनुयायी होते हैं। यह परंपरा जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने पर केंद्रित है। अघोरी प्रायः श्मशान घाटों या एकांत, रहस्यमयी स्थलों पर रहते हैं और तंत्र साधना करते हैं।

अघोरी के लिए ब्रह्मचर्य का कोई नियम नहीं है। वे इसे साधना का हिस्सा मानते हैं।

भोजन में अघोरी साधु मांसाहार का सेवन करते हैं, यहाँ तक कि कच्चा मांस तक खाते हैं। मान्यता है कि कुछ अघोरी शव के अवशेषों का भी प्रतीकात्मक सेवन करते हैं।

वे शरीर पर श्मशान की भस्म मलते हैं और अक्सर एक मानव खोपड़ी (कपाल) अपने पास रखते हैं, जो सांसारिक मोह-माया से विरक्ति और जीवन-मृत्यु के चक्र का प्रतीक है।

अघोरी भगवान शिव के भैरव स्वरूप और भगवान दत्तात्रेय की आराधना करते हैं।

नागा साधु – धर्म रक्षक और कठोर तपस्वी

नागा साधु धर्म की रक्षा और प्रचार के लिए प्रसिद्ध हैं। इनकी परंपरा का प्रारंभ 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने किया था।

नागा साधु बनने के लिए 12 वर्षों की कठोर तपस्या करनी पड़ती है। यह अखाड़ों में रहकर गुरु की देखरेख में पूरी होती है।

नागा साधु पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और जीवनभर मोह-माया से दूर रहते हैं।

उनका भोजन साधारण होता है और अधिकांश नागा साधु शाकाहारी होते हैं।

ये बिना वस्त्र रहते हैं या केवल भस्म से शरीर ढकते हैं।

नागा साधु भगवान शिव के वैरागी रूप की पूजा करते हैं।

मुख्य अंतर

निवास – अघोरी श्मशान में, नागा साधु अखाड़ों व हिमालय में।

साधना – अघोरी तंत्र साधना, नागा साधु धर्म प्रचार और वैराग्य साधना।

भोजन – अघोरी मांसाहारी (कभी शव भक्षण तक), नागा साधु अधिकांशतः शाकाहारी।

नियम – अघोरी पर ब्रह्मचर्य का बंधन नहीं, नागा साधु आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन।

आराधना – अघोरी शिव के भैरव रूप के उपासक, नागा शिव के वैरागी स्वरूप के।

मान्यता और रहस्य

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अघोरी साधु कलियुग में शिव के जीवित स्वरूप माने जाते हैं। उनकी साधना को रहस्यमयी और कभी-कभी डरावना भी माना जाता है। वहीं नागा साधु समाज में धर्म और भक्ति का संदेश फैलाते हैं।

नागा साधु और अघोरी साधु दोनों ही शिव भक्त हैं, परंतु दोनों की साधना की दिशा अलग है। नागा साधु धर्म रक्षा और समाज में धार्मिक चेतना फैलाते हैं, जबकि अघोरी जीवन और मृत्यु के पारलौकिक रहस्यों को जानने हेतु कठोर श्मशान साधना करते हैं। यही कारण है कि दोनों ही साधु पंथ भारतीय अध्यात्म में अद्वितीय और रहस्यमय माने जाते हैं।

What's Your Reaction?

Like Like 1
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0
Subir Sen Founder, RNI News