श्मशान और चिताभस्म का रहस्य: तांत्रिक परंपरा से दर्शन तक

Sep 1, 2025 - 12:05
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श्मशान और चिताभस्म का रहस्य: तांत्रिक परंपरा से दर्शन तक

कादीपुर (आरएनआई) मृत्यु का नाम सुनते ही मनुष्य का हृदय भय और शोक से भर जाता है। श्मशान को अक्सर अपवित्र और डरावना स्थान माना जाता है, जहाँ चिता, राख और मृत शरीरों की स्मृति रहती है। लेकिन सनातन परंपरा, तंत्र शास्त्र और दर्शन में श्मशान केवल भय का स्थल नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक और तात्त्विक महत्व से जुड़ा है।

तांत्रिक दृष्टि
शैव और शक्ति परंपराओं में श्मशान का विशेष स्थान है। काली, तारा, धूमावती और भैरव जैसे देवता श्मशान से सीधे जुड़े माने जाते हैं। कई साधनाएँ, जैसे शव साधना, श्मशान में ही पूर्ण होती हैं। तांत्रिक मान्यता है कि यहाँ पंच महाभूतों – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – का विलय होता है और मृत शरीर ब्रह्म तत्व में लीन हो जाता है।

दार्शनिक दृष्टि
श्मशान को वैराग्य की जन्मभूमि कहा गया है। यहाँ मनुष्य जीवन की नश्वरता और देह के असली स्वरूप का साक्षात्कार करता है। दर्शन कहता है कि चिता में जलने के बाद देह मिट्टी और राख में बदल जाती है, जिससे जीवन की अस्थायीता का बोध होता है। यह वैराग्य का मार्ग खोलता है और सत्य-असत्य का भेद स्पष्ट करता है।

चिताभस्म का महत्व
मृत्यु उपरांत बची राख को पंच महाभूतों का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि कई साधु-संत और तांत्रिक अपने शरीर पर चिताभस्म धारण करते हैं। यह केवल साधना का प्रतीक नहीं बल्कि जीवन की अनित्यता और मृत्यु की स्मृति भी है।

इंद्रियाँ और आत्मज्ञान
मानव की पाँच इंद्रियाँ—दृष्टि, श्रवण, गंध, रसना और स्पर्श—इच्छा, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को जन्म देती हैं। जब साधक ज्ञान रूपी अग्नि से इन अवगुणों को श्मशान की चिता की तरह जला देता है, तभी हृदय में चिद्-ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है।

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