ट्रंप नीति को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी — पासपोर्ट पर लिंग पहचान सीमित, ट्रांसजेंडर समुदाय में आक्रोश
वॉशिंगटन (आरएनआई) — अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को ऐसी विवादास्पद नीति लागू करने की अनुमति दे दी है, जिसके तहत ट्रांसजेंडर और नॉनबाइनरी व्यक्ति अब अपने पासपोर्ट पर स्वयं की लैंगिक पहचान दर्ज नहीं करा सकेंगे। यह फैसला ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है, जबकि ट्रांसजेंडर समुदाय में गहरा असंतोष देखा जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की 6-3 की बहुमत वाली बेंच ने कहा कि सरकार जब पासपोर्ट पर किसी व्यक्ति के “जन्म के समय दर्ज लिंग” का उल्लेख करती है, तो यह किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है, बल्कि यह “एक ऐतिहासिक तथ्य को दर्शाने” जैसा है। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को रोक दिया है, जिसमें सरकार को नागरिकों को ‘पुरुष’, ‘महिला’ या ‘अन्य’ लिंग चुनने की अनुमति देने का निर्देश दिया गया था।
लिबरल जजों का विरोध
फैसले का विरोध करने वाली तीन लिबरल जजों में से जस्टिस केतानजी ब्राउन जैक्सन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “यह नीति ट्रांसजेंडर लोगों को हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव के खतरे में डालती है। अदालत ने बिना किसी ठोस कारण के एक ऐसे कदम को मंजूरी दी है, जिससे हजारों लोगों को तत्काल नुकसान होगा।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह नीति ट्रंप प्रशासन के उस कार्यकारी आदेश की सोच से प्रेरित है, जिसमें ट्रांसजेंडर पहचान को “झूठा और विनाशकारी” कहा गया था।
समुदाय और मानवाधिकार संगठनों की नाराजगी
अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) के वकील जॉन डेविडसन ने फैसले को “बेहद दुखद और खतरनाक” बताया। उन्होंने कहा, “यह फैसला लोगों की असली पहचान को नकारने की कोशिश है और यह ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ सरकारी अभियान को बढ़ावा देगा।” कई ट्रांसजेंडर और नॉनबाइनरी लोगों ने अदालत में बताया था कि पासपोर्ट पर गलत लैंगिक पहचान होने से उन्हें हवाई अड्डों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अपमान, तलाशी और हिंसा का सामना करना पड़ता है।
ट्रंप प्रशासन का पक्ष
ट्रंप प्रशासन ने अदालत में तर्क दिया कि पासपोर्ट नीति विदेशी मामलों का हिस्सा है और यह पूरी तरह से कार्यपालिका (राष्ट्रपति) के अधिकार क्षेत्र में आती है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता अन्ना केली ने इस फैसले को “कॉमन सेंस और राष्ट्रपति ट्रंप की विचारधारा की जीत” बताया, जबकि अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी ने कहा, “सिर्फ दो ही लिंग हैं — पुरुष और महिला, और न्याय विभाग इस सच्चाई की रक्षा करता रहेगा।”
नीति का इतिहास
अमेरिका में पासपोर्ट पर जेंडर मार्कर दर्शाने की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी। 1990 के दशक में डॉक्टर के प्रमाण पत्र के साथ लिंग परिवर्तन की अनुमति दी गई। जो बाइडन प्रशासन ने 2021 में नियमों में ढील दी थी, जिसके तहत बिना किसी मेडिकल दस्तावेज के नागरिक ‘X’ (तीसरा जेंडर) विकल्प चुन सकते थे। लेकिन ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में यह आदेश दिया कि अमेरिका केवल दो लिंग — पुरुष और महिला को ही मान्यता देगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला फिलहाल बाइडन-काल की उदार नीति को अस्थायी रूप से निरस्त करता है और ट्रंप प्रशासन को अपनी सख्त नीति लागू करने की अनुमति देता है — जब तक कि इस मुकदमे पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता।
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