परमहंस और माँ काली की रहस्यमयी रात: जब भोग स्वयं देवी ने किया ग्रहण
कोलकाता (आरएनआई)। ईश्वर को कर्मकांड और शास्त्रों में खोजने वाली दुनिया के बीच श्री रामकृष्ण परमहंस ने भक्ति और अंतरंग साधना से दिव्यता का अनुभव किया। दक्षिणेश्वर काली मंदिर में उनकी साधना से जुड़ा एक प्रसंग आज भी रहस्य और आस्था का प्रतीक है।
जानकारी के अनुसार, प्रारंभिक दिनों में रामकृष्ण परमहंस माँ काली की मूर्ति से बातें करते थे। लोग उन्हें पागल समझकर मज़ाक उड़ाते थे। पर समय के साथ उनकी साधना का चमत्कार स्वयं प्रकट होने लगा।
बताया जाता है कि वे गर्भगृह में माँ काली को भोग अर्पित करते और गहन तल्लीनता में घंटों बैठे रहते। उनके लिए माँ की उपस्थिति में समय का कोई अस्तित्व नहीं था।
ऐसे ही एक दिन उनकी पत्नी माँ शारदा देवी ने उन्हें खोजने के लिए गर्भगृह का रुख किया। वहाँ उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा—माँ काली जीवित स्वरूप में प्रकट हुईं और रामकृष्ण परमहंस के हाथों से भोग ग्रहण कर रही थीं। यह अनुभव शारदा देवी के जीवन को हमेशा के लिए बदल गया। उसी क्षण उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि उनके पति मात्र साधक नहीं, बल्कि ईश्वर के चुने हुए हैं।
सनातन धर्म की परंपरा भी यही कहती है कि मूर्ति मात्र पत्थर नहीं होती। श्रद्धा, मंत्र और भक्ति के साथ वह सचेतन और जीवंत रूप धारण कर लेती है। यही कारण है कि आज भी भारत के मंदिरों में जीवित देवताओं की परंपरा जारी है।
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