छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा का पर्व: छेरछेरा, जहाँ दान से बनता है सामाजिक समरसता

Saturday, January 3, 2026 - 22:50
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छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा का पर्व: छेरछेरा, जहाँ दान से बनता है सामाजिक समरसता

छत्तीसगढ़ (आरएनआई) छत्तीसगढ़ की माटी, उसकी संस्कृति और लोक परंपराओं में रचा-बसा छेरछेरा पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, दान और मानवता का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व हर वर्ष माघ माह की पूर्णिमा को पूरे छत्तीसगढ़ में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। गाँव की गलियों से लेकर शहर की बस्तियों तक, इस दिन लोकसंस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिलती है।

छेरछेरा का सीधा संबंध नई फसल के आगमन से है। धान की कटाई के बाद जब घर-घर अनाज भर जाता है, तब समाज का हर व्यक्ति यह संकल्प लेता है कि उसकी खुशहाली में कोई भी वंचित न रहे। इसी भावना के साथ बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोलियों में घर-घर जाकर अन्न, चावल, धान, सब्ज़ी या धन का संग्रह करते हैं। यह संग्रह बाद में सामूहिक भोज या जरूरतमंदों में वितरण के काम आता है।

छेरछेरा पर्व का संबंध छत्तीसगढ़ के कलचुरी राजवंश से गहराई से जुड़ा है। लोकमान्यता के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत कलचुरी शासक राजा कल्याणसाय के समय हुई। कहा जाता है कि राजा कल्याणसाय लगभग आठ वर्षों की मुगल कैद के बाद जब रतनपुर लौटे, तब उनकी प्रजा ने हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया। इस ऐतिहासिक अवसर पर रानी फुलकेना ने प्रजा पर सोने-चांदी की वर्षा करवाई और इस दिन को एक वार्षिक पर्व के रूप में घोषित किया। समय के साथ यह परंपरा राजदरबार से निकलकर जन-जन तक पहुँची और छेरछेरा एक फसल उत्सव के रूप में स्थापित हो गया, जहाँ संपन्नता को समाज के हर वर्ग के साथ साझा करने की भावना प्रमुख रही।

लोकमान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति छेरछेरा के दिन दान करता है, उसके घर अन्नदेवी का वास होता है। छेरछेरा त्यौहार की पौराणिक कथाएँ मुख्यतः दान, अन्नदान और देवी-देवताओं से जुड़ी हैं, जो कृषि समृद्धि और भिक्षाटन की भावना को दर्शाती हैं।

शिव-अन्नपूर्णा कथा: भगवान शिव ने पौष पूर्णिमा को माता अन्नपूर्णा से भिक्षा मांगी थी, जो दान के पुण्य का प्रतीक बनी। इससे त्यौहार अन्नदान पर केंद्रित हो गया।

शाकंभरी देवी कथा: माता दुर्गा ने अकाल के समय शाकंभरी अवतार लिया, भूखे ऋषियों को सब्जियां-फल दिए। यह कथा पर्व के दौरान साग-भाजी दान से जुड़ी है।

अन्य मान्यताएँ: पांडरी दाई और पुंगर दाई (अन्नपूर्णा दाता) नामक बहनों ने हर गांव में अनाज भंडार स्थापित करने की परंपरा शुरू की। बस्तर में शिव-पार्वती विवाह पूर्व परीक्षा का प्रतीक भी माना जाता है।

एक प्रसिद्ध लोककथा में कहा जाता है कि किसी समय एक राजा ने साधु का वेश धारण कर प्रजा की दानशीलता की परीक्षा ली थी। जिन घरों ने खुले मन से दान दिया, वे सदैव सुख-समृद्धि से भरे रहे। तभी से यह विश्वास प्रचलित हुआ कि छेरछेरा में दान करने से कभी कमी नहीं आती।

छेरछेरा की पहचान इसके लोकगीत हैं। ढोलक, थाली और मंजीरे की ताल पर गाए जाने वाले गीतों में हास्य, अपनापन और दान की अपील छिपी होती है— _"छेरछेरा… छेरछेरा… माई कोठी के धान ला हेर हेरा!"_ इन गीतों के माध्यम से बच्चे न केवल दान मांगते हैं, बल्कि लोकसंस्कृति को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।

आज जब समाज तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, तब भी छेरछेरा पर्व यह याद दिलाता है कि सामाजिक जिम्मेदारी और आपसी सहयोग ही किसी भी सभ्यता की असली ताकत है। शहरों में भी लोग इस परंपरा को नए रूप में निभा रहे हैं—कहीं सामूहिक दान, तो कहीं सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचाई जा रही है।

छेरछेरा छत्तीसगढ़ की लोक आत्मा का ऐसा पर्व है, जो सिखाता है कि खुशहाली तभी सार्थक है, जब वह सबके साथ साझा की जाए। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को दान, करुणा और समानता का संदेश देता रहेगा।

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