श्री गणेश पञ्चरत्न स्तोत्रम्: विघ्न नाश, सुख-समृद्धि और बुद्धि-विवेक की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण स्तोत्र
नई दिल्ली (आरएनआई) आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्रीगणेशपञ्चरत्नस्तोत्रम् को श्रद्धापूर्वक प्रातःकाल पढ़ने से विघ्नों का नाश होता है और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि, बुद्धि-विवेक तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस स्तोत्र में पाँच रत्नों के माध्यम से भगवान गणेश के विविध गुणों और स्वरूप का वर्णन किया गया है:
प्रथम रत्न – मुदाकर, कलाधरावत्सक, विलासिलोक रंजक, दैत्य विनाशक गणेश का गुणगान।
द्वितीय रत्न – भयंकर, नवोदितार्कभास्वर, सुरारि नाशक, महेश्वर गणेश का वर्णन।
तृतीय रत्न – दैत्यकुञ्जर विनाशक, कृपाकरी, यशस्करी, मनोकामना पूर्ण करने वाले गणेश का गौरवगान।
चतुर्थ रत्न – अकिञ्चनार्तिनाशक, पुरारिपूर्वनन्दन, धनञ्जयादिभूषण, पुराणवारण गणेश का सम्मान।
पञ्चम रत्न – अचिन्त्य रूप वाले एकदन्त गणेश का ध्यान और उनका चिंतन।
जो व्यक्ति इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, वह सभी प्रकार के दोषों से मुक्त होता है, समस्त लोकों के कल्याण में योगदान देता है और मोक्ष की प्राप्ति करता है।
धार्मिक और आध्यात्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्तोत्र विशेष रूप से प्रातःकाल में पढ़ने योग्य है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता लाने में सहायक है।
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