पत्रकार उत्पीड़न मामला राष्ट्रीय स्तर पर गर्माया, महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग ने मांगा जवाब
रायपुर (आरएनआई) छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के साथ हुई कथित मारपीट, उत्पीड़न और आधी रात पुलिस कार्रवाई का मामला अब राज्य की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। लगभग एक महीने तक राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से किसी कार्रवाई का संकेत न मिलने के बाद अब राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) दोनों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है।
यह वही मामला है जिसमें ‘बुलंद छत्तीसगढ़’ और ‘न्यूज़ 21’ के पत्रकारों के साथ जनसंपर्क विभाग के अपर संचालक संजीव तिवारी द्वारा कथित गाली-गलौज और मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसके बाद 10 अक्टूबर की रात पत्रकार मनोज पांडे के घर पुलिस बिना वारंट पहुंची, ताला तोड़कर घर में घुसी और परिवार में मौजूद महिलाओं से कथित अभद्रता की। इस पूरी घटना को लेकर पत्रकार की पत्नी सुनीता पांडे ने मुख्यमंत्री, गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग सहित कई संस्थाओं को शिकायत भेजी थी।
राज्य स्तर पर कार्रवाई न होने के बीच राष्ट्रीय महिला आयोग ने 11 नवंबर 2025 को रायपुर पुलिस को पत्र जारी कर मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए 30 दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट भेजने का आदेश दिया है। पत्र में आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट नहीं भेजी गई तो आयोग वैधानिक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा। आयोग की यह कठोर टिप्पणी पीड़िता और पत्रकार समुदाय के लिए राहत का संकेत मानी जा रही है, क्योंकि अब तक राज्य की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया था।
उधर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सुनीता पांडे की शिकायत को प्राथमिकता पर दर्ज करते हुए मामला स्वीकार कर लिया है। शिकायत संख्या 602/33/14/2025 के तहत दर्ज यह केस मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है, क्योंकि कथित घटनाक्रम में बिना वारंट घर में प्रवेश किया गया, पुलिस दल में कोई महिला कर्मी मौजूद नहीं थी और महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार किया गया। आयोग इस प्रकार की परिस्थितियों को गंभीर मानवाधिकार हनन मानता है।
पत्रकार जगत में बढ़ते असंतोष का माहौल इस बात को लेकर भी है कि एक महीने बीत जाने के बाद भी न अधिकारी संजीव तिवारी पर कार्रवाई हुई, न ही उस पुलिस टीम पर जिसकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। कई पत्रकार संगठनों ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया है और कहा है कि यदि राज्य सरकार इस मामले में मौन रही तो यह बेहद खतरनाक परंपरा को जन्म देगा।
दोनों राष्ट्रीय आयोगों के इस प्रकरण में सक्रिय होने के बाद अब प्रशासन पर दबाव बढ़ना तय है। रायपुर पुलिस को 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपनी अनिवार्य है, जबकि मानवाधिकार आयोग अपनी प्रारंभिक जांच आगे बढ़ाएगा। आयोग जरूरत पड़ने पर पीड़ित परिवार की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित कराने और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की अनुशंसा भी कर सकता है।
अब नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं, और दोनों शीर्ष राष्ट्रीय संस्थाओं की जांच से इस संवेदनशील प्रकरण में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं।
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