तंत्र विद्या पर समाज की गलतफहमी, तांत्रिकों की छवि डर और अंधविश्वास से जुड़ी
कादीपुर (आरएनआई)। समाज में ‘तांत्रिक’ शब्द को लेकर दोहरे अर्थ और धारणाएं पाई जाती हैं। एक ओर यह शब्द तंत्र विद्या से जुड़े साधकों के लिए प्रयोग होता है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक संदर्भों में इसे सामाजिक तंत्र और व्यवस्था से जोड़कर भी देखा जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, तंत्र हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म की एक गूढ़ आध्यात्मिक साधना है, जिसका मूल उद्देश्य देवी-शक्ति की आराधना और आत्म-शक्ति का विकास है। तांत्रिक वही व्यक्ति कहलाता है जो इस विद्या का अभ्यास करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तंत्र विद्या की प्रकृति भौतिक और आध्यात्मिक दोनों है। यह शरीर और मन को मजबूत बनाकर साधक को सांसारिक तथा आध्यात्मिक लाभ पहुंचाती है। हालांकि समाज में तांत्रिकों को लेकर नकारात्मक धारणाएं प्रचलित हैं। अंधविश्वास और गलत प्रयोगों के कारण लोग इसे भयावह और नुकसान पहुंचाने वाली विद्या मानते हैं।
जानकारों के अनुसार तंत्र विद्या को नकारात्मक शक्तियों से जोड़ना एक बड़ी गलतफहमी है। असल में यह आत्मिक शक्ति और साधना का मार्ग है। लेकिन यह भी सच है कि बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के इसका अभ्यास करना खतरनाक हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तंत्र विद्या को सही शिक्षा और परंपरागत नियमों के तहत समझा जाए तो यह आत्म-शक्ति के विकास का सशक्त माध्यम है, न कि भय और अंधविश्वास का पर्याय।
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