गोवर्धन पूजा 2025: श्रीकृष्ण भक्ति और प्रकृति सम्मान का पर्व
नई दिल्ली (आरएनआई) दीपावली के उत्सव के ठीक अगले दिन देशभर में आज गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा है। मंदिरों से लेकर घर-आंगनों तक श्रद्धालुओं ने गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की तैयारी की।
पंचांग के अनुसार, इस वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 21 अक्टूबर शाम 5:54 बजे से शुरू होकर 22 अक्टूबर रात 8:16 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के अनुसार पूजा का मुख्य दिन 22 अक्टूबर को तय किया गया है। पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातः 6:26 से 8:42 बजे तक और सायं 3:29 से 5:44 बजे तक रहेगा।
पर्व का महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में जब इंद्रदेव ने ब्रजभूमि पर लगातार वर्षा कर संकट पैदा किया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका (छोटी उंगली) पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसीलिए यह पर्व प्रकृति, पर्वत और गोसेवा का प्रतीक माना जाता है। इसे “अन्नकूट” भी कहा जाता है, जिसमें भक्तजन भगवान को 56 प्रकार के व्यंजन अर्पित करते हैं।
देशभर में उत्साह
मथुरा, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना में लाखों श्रद्धालु आज सुबह से ही मंदिरों में उमड़े। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगी हैं। दिल्ली, हरिद्वार, जयपुर, बनारस और इंदौर जैसे शहरों में भी मंदिरों को फूलों और दीपों से सजाया गया है। मंदिरों में “अन्नकूट भोग” लगाया गया और “गोवर्धन महाराज की जय” के जयघोष से वातावरण गूंज उठा।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों को पर्व की शुभकामनाएँ दीं। दोनों ने कहा कि गोवर्धन पूजा हमें प्रकृति और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने की प्रेरणा देती है।
पूजा विधि और परंपरा
भक्तजन गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतिरूप बनाकर उस पर फूल, दीपक, दूध, दही, मिठाई और अन्नकूट अर्पित करते हैं। इसके बाद परिवार सहित परिक्रमा की जाती है और श्रीकृष्ण-बलराम के जयकारे लगाए जाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, पूजा के दौरान स्वच्छता और सात्त्विकता का ध्यान रखना चाहिए। तामसिक भोजन, शराब या मांसाहार से बचना चाहिए।
पर्यावरण और सामाजिक संदेश
गोवर्धन पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, गौ-सेवा और अन्न-संवर्धन का उत्सव भी है। इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं की सजावट, गौ-पूजन और स्थानीय मेले का आयोजन किया जाता है।
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