इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जजों की नियुक्ति को मंजूरी, कॉलेजियम ने पांच रिटायर्ड जजों के नाम किए स्वीकृत

Wednesday, February 4, 2026 - 11:58
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जजों की नियुक्ति को मंजूरी, कॉलेजियम ने पांच रिटायर्ड जजों के नाम किए स्वीकृत

नई दिल्ली (आरएनआई)। न्यायिक लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को कम करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अहम फैसला लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांच सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ (एड-हॉक) जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इनकी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 224-A के तहत दो वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी।

कॉलेजियम ने स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित मामलों की भारी संख्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया है। तदर्थ जज अस्थायी रूप से पीठ पर बैठकर मामलों की सुनवाई करेंगे, जिससे पुराने मामलों के निस्तारण में तेजी आने की उम्मीद है। संविधान में यह प्रावधान पहले से मौजूद है, लेकिन इसका उपयोग अब तक बहुत सीमित रहा है। बढ़ते न्यायिक बोझ के मद्देनजर इसे सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है।

अनुच्छेद 224-A के तहत किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से अनुरोध कर सकते हैं कि वे अस्थायी रूप से उसी या किसी अन्य हाईकोर्ट में बैठकर न्यायिक कार्य करें। ऐसे तदर्थ जजों को नियमित न्यायाधीशों के समान अधिकार प्राप्त होते हैं। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करना है।

तीन फरवरी को हुई कॉलेजियम की बैठक में जिन पांच रिटायर्ड जजों के नामों को मंजूरी दी गई, वे सभी इलाहाबाद हाईकोर्ट में तदर्थ जज के रूप में कार्य करेंगे। इनमें जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान, जस्टिस मोहम्मद असलम, जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी, जस्टिस रेनू अग्रवाल और जस्टिस ज्योत्स्ना शर्मा शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी न्यायालयों में लंबित मामलों की स्थिति पर चिंता जता चुका है। अप्रैल 2021 में शीर्ष अदालत ने देश के हाईकोर्टों में लंबित लगभग 57 लाख मामलों को ‘डॉकेट एक्सप्लोजन’ यानी मामलों की बाढ़ बताया था। तब अदालत ने अनुच्छेद 224-A के प्रावधान को सक्रिय करने पर जोर देते हुए तदर्थ जजों की नियुक्ति के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह सीमा भी तय की थी कि तदर्थ जजों की संख्या किसी हाईकोर्ट की कुल स्वीकृत न्यायाधीश संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्थायी नियुक्तियां न्यायिक कार्य में सहयोग दें, लेकिन नियमित न्यायिक ढांचे का संतुलन भी बना रहे।

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