1947 में सिर्फ देश नहीं, फौज भी बंटी थी: कैसे हुआ भारतीय सेना का बंटवारा?
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन आजादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ। जमीन, प्रशासन और सरकारी संपत्तियों के साथ ब्रिटिश इंडियन आर्मी का भी भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा किया गया। यह प्रक्रिया बेहद जटिल थी, क्योंकि वर्षों से साथ सेवा कर रहे सैनिकों और अधिकारियों को अलग-अलग सेनाओं का हिस्सा बनना पड़ा।
जून 1947 में सेना के पुनर्गठन के लिए सशस्त्र बल पुनर्गठन समिति बनाई गई। इसकी देखरेख तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल सर क्लॉड ऑचिनलेक ने की। सेना और सैन्य संसाधनों के बंटवारे के लिए लगभग 2:1 का अनुपात तय किया गया, जिसके तहत करीब 64 प्रतिशत संसाधन भारत और 36 प्रतिशत पाकिस्तान को मिलने थे।
सैनिकों के बंटवारे में रेजिमेंटों की संरचना और सैनिकों की पसंद को ध्यान में रखा गया। मुस्लिम बहुल रेजिमेंटों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया, जबकि सिख, डोगरा, जाट और राजपूत जैसी रेजिमेंटें भारतीय सेना में रहीं। मिश्रित रेजिमेंटों के सैनिकों को विकल्प दिया गया कि वे भारत या पाकिस्तान में से किस सेना में सेवा जारी रखना चाहते हैं।
इसी दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों के सामने भी देश चुनने का सवाल आया। सैम मानेकशॉ ने भारत में रहने का फैसला किया और आगे चलकर भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल बने। वहीं ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने पाकिस्तान की पेशकश ठुकराकर भारत के प्रति अपनी निष्ठा कायम रखी और 1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए।
गोरखा सैनिकों का बंटवारा अलग व्यवस्था के तहत हुआ। भारत को छह गोरखा रेजिमेंट मिलीं, जबकि चार रेजिमेंट ब्रिटिश सेना के साथ चली गईं।
सिर्फ सैनिक ही नहीं, हथियार और सैन्य उपकरण भी बांटे गए। टैंक, तोप, राइफल, वाहन, वर्दी, जूते और अन्य सैन्य सामान का हिसाब तैयार किया गया। सैन्य गोदामों से लेकर दफ्तरों की कुर्सियों, मेजों, टाइपराइटरों, लाइब्रेरी की किताबों और रेजिमेंटल मेस के सामान तक का बंटवारा किया गया।
बंटवारे के दौरान पंजाब में भड़के दंगों ने सैन्य सामान के हस्तांतरण को भी प्रभावित किया। पाकिस्तान भेजे जा रहे सैन्य सामान की कुछ ट्रेनों पर हमले और लूट की घटनाएं हुईं, जिससे सामान पहुंचाने में मुश्किलें आईं।
नौसेना और वायुसेना का भी पुनर्गठन किया गया। नौसैनिक संसाधनों और ठिकानों का बंटवारा दोनों देशों की जरूरतों के अनुसार किया गया, जबकि वायुसेना की इकाइयों और विमानों को भी भारत और पाकिस्तान के बीच बांटा गया।
सबसे भावुक दौर वह था जब पुराने साथी सैनिक अलग-अलग सेनाओं में जाने लगे। जिन लोगों ने वर्षों तक एक साथ प्रशिक्षण लिया, एक ही बैरक में रहे और युद्ध के मैदान में एक-दूसरे की मदद की, उन्हें अब अलग-अलग देशों की वर्दी पहननी थी।
1947 का विभाजन सिर्फ सीमाओं का बंटवारा नहीं था। इसने एक साझा सेना, संस्थाओं और वर्षों पुराने सैन्य भाईचारे को भी दो हिस्सों में बांट दिया।
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