कुंडलिनी साधना का ‘परम तत्व’ रहस्य: शिव को बताया सृष्टि का मूल आधार
किसी भी साधना को समझने से पहले उसके मूल तत्व को जानना आवश्यक है। बिना मूल सिद्धांत को समझे साधना करना ऐसा है जैसे रात में बिना रोशनी के वाहन चलाना। इसी विचार के आधार पर इस लेख में कुंडलिनी साधना और शिव तत्व की आध्यात्मिक अवधारणा को समझाया गया है।
लेख के अनुसार, सृष्टि के मूल में एक परम तत्व है, जिसे वैदिक परंपरा में परब्रह्म या परमात्मा और शैव परंपरा में महादेव या सदाशिव के रूप में जाना जाता है। इसे निराकार, निर्विकार, शाश्वत और सर्वव्यापी बताया गया है।
इस विचारधारा में शिव को किसी भौतिक आकृति तक सीमित नहीं माना गया है। मंदिरों और चित्रों में दिखाई देने वाले शिव के स्वरूपों को उनके विभिन्न गुणों का प्रतीक बताया गया है। लेख में कहा गया है कि यह परम तत्व स्वयं सांसारिक नहीं है, लेकिन प्रकृति और समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का आधार माना जाता है।
लेख में सदाशिव और सगुण शिव के बीच भी अंतर बताया गया है। इसके अनुसार सदाशिव निर्गुण और निराकार परम तत्व हैं, जबकि राजराजेश्वर शिव या विष्णु को सगुण रूप में जीव और सृष्टि के संचालन से जोड़ा गया है।
कुंडलिनी और ऊर्जा चक्रों की व्याख्या करते हुए लेख में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का उल्लेख किया गया है। इसमें मूलाधार, सहस्रार और अनाहत जैसे ऊर्जा केंद्रों को शरीर की आध्यात्मिक संरचना से जोड़ते हुए कहा गया है कि विभिन्न ऊर्जा केंद्रों की सक्रियता व्यक्ति के स्वभाव और कार्यप्रणाली को प्रभावित करती है।
लेख में आगे तीन मूल बिंदुओं से विभिन्न ऊर्जा केंद्रों के विकास और उनसे नवशक्ति, नवदुर्गा तथा अन्य आध्यात्मिक अवधारणाओं के संबंध की व्याख्या की गई है। इसके अनुसार सदाशिव को समस्त इकाई में व्याप्त मूल तत्व और राजराजेश्वर शिव को उसके संचालन से जुड़ा सगुण केंद्र माना गया है।
लेख का मूल संदेश यही है कि किसी भी आध्यात्मिक साधना को अपनाने से पहले उसके मूल सिद्धांत और उद्देश्य को समझना जरूरी है। साथ ही इसमें साधना के दौरान अनुशासन, आज्ञाकारिता और उचित मार्गदर्शन को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)