विपक्ष और सत्ता के रिश्तों का बदला दौर? नेहरू से मनमोहन तक के उदाहरण गिनाकर मौजूदा राजनीति पर उठाए सवाल
देश की राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद, असहमति और आपसी सम्मान को लेकर बहस एक बार फिर तेज है। इसी संदर्भ में एक लेख में आजादी के बाद से अब तक के कई राजनीतिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि पहले के दौर में वैचारिक मतभेदों के बावजूद नेताओं के बीच संवाद और व्यक्तिगत संबंधों की गुंजाइश ज्यादा थी, जबकि मौजूदा दौर में राजनीतिक टकराव बढ़ गया है।
लेख में 1947 के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विपक्षी विचारधारा से जुड़े डॉ. बी.आर. अंबेडकर को कानून मंत्री और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया था। इसे सत्ता में व्यापक भागीदारी और देश के नवनिर्माण के लिए अलग-अलग विचारधाराओं को साथ लेने की नीति के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है।
इसमें नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच संसदीय संबंधों का भी उल्लेख है। दावा किया गया है कि वाजपेयी के तीखे राजनीतिक भाषणों के बावजूद नेहरू उनके विचारों का सम्मान करते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान विपक्ष की मांग पर संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने और सरकार की नीतियों पर खुली बहस होने को भी इसी राजनीतिक संस्कृति का उदाहरण बताया गया है।
1963 में आचार्य जेबी कृपलानी द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का हवाला देते हुए लेख में कहा गया है कि भारी बहुमत वाली कांग्रेस सरकार ने भी विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया। इसी तरह 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा इंदिरा गांधी के नेतृत्व की सराहना और इंदिरा गांधी द्वारा विपक्षी नेताओं को विदेशों में भारत का पक्ष रखने के लिए प्रतिनिधिमंडलों में शामिल किए जाने का उल्लेख किया गया है।
लेख में 1977 का एक प्रसंग भी सामने रखा गया है। जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी ने विदेश मंत्रालय से हटाई गई पंडित नेहरू की तस्वीर को दोबारा सम्मानपूर्वक लगाए जाने का निर्देश दिया था। इसे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद पूर्व नेताओं के प्रति सम्मान की मिसाल के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
1984 के चुनावों के बाद राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा प्रसंग भी लेख में शामिल है। इसमें दावा किया गया है कि वाजपेयी की गंभीर बीमारी के दौरान राजीव गांधी ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल कराया, जिससे उन्हें अमेरिका में इलाज कराने का अवसर मिला।
इसके बाद 1991 के आर्थिक संकट और पी.वी. नरसिम्हा राव तथा डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उस समय सरकार ने विपक्षी नेताओं से संवाद कर महत्वपूर्ण फैसलों के लिए समर्थन जुटाया। 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के दौरान भी सरकार और विपक्ष के बीच लंबी संसदीय बहस का उल्लेख किया गया है।
लेख का सबसे बड़ा सवाल मौजूदा राजनीतिक माहौल को लेकर है। इसमें आरोप लगाया गया है कि 2014 के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ा है और संसद में विपक्ष की भूमिका कमजोर हुई है। 2023 के शीतकालीन सत्र में 146 सांसदों के निलंबन का उदाहरण देते हुए इसे संसदीय संवाद में गिरावट का संकेत बताया गया है।
लेख में ईडी और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और राजनीतिक भाषा के गिरते स्तर को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। साथ ही दावा किया गया है कि विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा है।
हालांकि, लेख में किए गए कई राजनीतिक और ऐतिहासिक दावे लेखक के दृष्टिकोण और आरोपों के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि और उनके ऐतिहासिक संदर्भों की अलग-अलग जांच जरूरी है।
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