लखनऊ की त्रासदियों का काला इतिहास: हादसे नहीं, व्यवस्था की विफलता की कीमत चुकाते लोग
कुमार सौवीर
लखनऊ के अलीगंज सेक्टर-डी स्थित एक व्यावसायिक भवन में लगी भीषण आग ने 15 युवाओं की जान ले ली। अधिकांश की मौत दम घुटने से हुई। यह केवल एक अग्निकांड नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जो हादसों के बाद तो सक्रिय दिखती है, लेकिन उन्हें रोकने के लिए समय रहते कार्रवाई नहीं करती।
लखनऊ के इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि यहां बड़े हादसे अचानक नहीं होते। उनकी पृष्ठभूमि पहले से तैयार होती है। नियमों की अनदेखी होती है, अवैध निर्माण खड़े होते हैं, सुरक्षा मानकों को दरकिनार किया जाता है और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंद लेते हैं। जब त्रासदी घटती है, तब वही लोग संवेदनाएं व्यक्त करते और जांच के आदेश देते नजर आते हैं।

साल 1984 में गोमती नदी में प्रतिमा विसर्जन के दौरान लगभग 39 युवकों की डूबने से मौत हो गई थी। उस समय न पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था थी और न ही प्रशासनिक सतर्कता। एक के बाद एक नावें डूबती रहीं और दर्जनों परिवार उजड़ गए। आज भी रिसालदार पार्क में लगा स्मारक उस दर्दनाक हादसे की याद दिलाता है।
इसके बाद वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर आयोजित साड़ी वितरण कार्यक्रम में भगदड़ मच गई। महानगर थाने के सामने हुए इस आयोजन में भीड़ नियंत्रण की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि दो बच्चों समेत 26 लोगों की मौत हो गई। सवाल उठे, लेकिन जवाब कभी नहीं मिले। सत्ता मजबूत थी और मरने वाले गरीब लोग थे, इसलिए कुछ समय बाद मामला इतिहास के पन्नों में दब गया।
अब अलीगंज का अग्निकांड फिर वही सवाल खड़े कर रहा है। जिस इमारत में आग लगी, वहां कोचिंग सेंटर, गेमिंग जोन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं। क्या भवन के पास वैध अग्निशमन अनुमति थी? क्या पर्याप्त निकास मार्ग उपलब्ध थे? क्या नियमित सुरक्षा निरीक्षण हुए थे? यदि नहीं, तो जिम्मेदार कौन है? और यदि हुए थे, तो यह इमारत मौत का जाल कैसे बन गई?

शहर में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि कई व्यावसायिक प्रतिष्ठान बिना पर्याप्त अग्नि सुरक्षा मानकों के संचालित हो रहे हैं। नोटिस जारी होते हैं, लेकिन कार्रवाई अधूरी रह जाती है। निरीक्षण होते हैं, लेकिन परिणाम अक्सर फाइलों तक सीमित रह जाते हैं। सवाल यह है कि सुरक्षा मानकों की कीमत आखिर किसकी जेब में चली जाती है?
गोमती हादसा, साड़ी कांड और अलीगंज अग्निकांड—इन तीनों घटनाओं में एक समानता दिखाई देती है। हादसे से पहले चेतावनी के संकेत मौजूद थे, नियमों का उल्लंघन हो रहा था, लेकिन जिम्मेदार तंत्र मौन रहा। हादसे के बाद जांच, मुआवजा और कार्रवाई के आश्वासन दिए गए, लेकिन समय बीतने के साथ सब कुछ भुला दिया गया।
लखनऊ की सबसे बड़ी त्रासदी केवल यह नहीं है कि यहां हादसे होते हैं। असली त्रासदी यह है कि हादसों के कारण सभी जानते हैं, लेकिन उन्हें रोकने की इच्छाशक्ति अक्सर दिखाई नहीं देती। जब व्यवस्था की संवेदनशीलता समाप्त होने लगती है, तब सड़कों पर दौड़ती एंबुलेंसें केवल घायलों को नहीं ले जातीं, बल्कि शासन और प्रशासन की विफलताओं की कहानी भी अपने साथ लेकर चलती हैं।
अलीगंज का यह अग्निकांड एक बार फिर पूछ रहा है—क्या इस बार भी कुछ दिन शोक, कुछ घोषणाएं, कुछ जांचें और फिर खामोशी होगी, या वास्तव में जिम्मेदारी तय कर भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जाएगा?
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