मोदी शासन पर तीखी आलोचना: लोकतंत्र के क्षरण, बढ़ती असमानता और धार्मिक ध्रुवीकरण पर उठे गंभीर सवाल
नई दिल्ली (आरएनआई)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते लगभग 12 वर्षों के शासनकाल को लेकर लोकतंत्र, आर्थिक असमानता और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर बहस छिड़ी हुई है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और विश्लेषणों में यह दावा किया गया है कि इस अवधि में भारत के लोकतांत्रिक ढांचे, संस्थागत स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
स्वीडन स्थित V-Dem Institute की 2025 की डेमोक्रेसी रिपोर्ट में भारत को “इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी” की श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार देश में बहुदलीय चुनाव तो जारी हैं, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की आज़ादी और नागरिक समाज की भूमिका पर दबाव बढ़ा है। इसी तरह Freedom House और Reporters Without Borders ने भी भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रेस की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। 2025 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को 151वां स्थान दिया गया, जिसमें मीडिया पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव, मालिकाना हक की एकाग्रता और पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुख कारण बताया गया।
आलोचकों का कहना है कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ कठोर कानूनों के इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर नियंत्रण और संसद में सीमित बहस जैसी घटनाएं कार्यपालिका के बढ़ते प्रभाव की ओर संकेत करती हैं। नोटबंदी, जीएसटी और नागरिकता संशोधन कानून जैसे बड़े फैसलों को भी पर्याप्त संसदीय चर्चा के बिना लागू किए जाने को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में सवाल उठते रहे हैं।
आर्थिक मोर्चे पर भी असमानता को लेकर बहस तेज हुई है। World Inequality Report 2026 के अनुसार भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में शामिल हो चुका है, जहां शीर्ष 1 प्रतिशत आबादी के पास राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत के पास करीब 65 प्रतिशत संपत्ति केंद्रित है। रिपोर्ट के मुताबिक आय वितरण में भी बड़ा अंतर है, जहां शीर्ष 10 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आय का लगभग 58 प्रतिशत प्राप्त करते हैं, जबकि निचले 50 प्रतिशत को केवल 15 प्रतिशत आय मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक नीतियों और बाजार संरचना में असंतुलन ने इस खाई को और गहरा किया है।
सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर धार्मिक ध्रुवीकरण का मुद्दा भी चर्चा के केंद्र में रहा है। विभिन्न शोध समूहों और निगरानी संस्थाओं ने पिछले कुछ वर्षों में नफरत फैलाने वाले भाषणों और सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की है। विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक विमर्श में धर्म और पहचान की बढ़ती भूमिका ने समाज में विभाजन को गहरा किया है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि सरकार सांस्कृतिक पहचान और बहुसंख्यक भावनाओं को सम्मान देने की नीति पर चल रही है।
पूर्वोत्तर राज्य Manipur में 2023 से जारी हिंसा को भी केंद्र सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस संघर्ष में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए। सुप्रीम कोर्ट ने भी वहां कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। हालांकि सरकार का कहना है कि शांति बहाल करने और पुनर्वास की प्रक्रिया जारी है।
इसी तरह 2002 के 2002 Gujarat riots की विरासत और उसके राजनीतिक प्रभाव पर भी समय-समय पर बहस होती रही है। आलोचकों का कहना है कि उस दौर की घटनाओं ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की गहरी छाप छोड़ी, जबकि अदालतों द्वारा कई मामलों में फैसले दिए जा चुके हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां आर्थिक विकास, तकनीकी उपलब्धियों और वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती, सामाजिक समावेशन और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थागत स्वतंत्रता, न्यायपालिका और मीडिया की मजबूती, तथा समावेशी विकास की नीतियां ही देश को दीर्घकालिक स्थिरता और संतुलन की दिशा में आगे ले जा सकती हैं।
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