क्या पत्रकारिता आईसीयू में है? पतन पत्रकारिता का है या यह सामाजिक संक्रमण है?
राजेन्द्र सिंह जादौन
आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह सचमुच आईसीयू में पहुंच चुकी है? अगर ऐसा है तो बीमारी क्या है—आर्थिक संकट, राजनीतिक दबाव, कॉरपोरेट नियंत्रण, टीआरपी की होड़, सोशल मीडिया की अंधी दौड़ या फिर पत्रकारिता के भीतर पैदा हुआ वह संक्रमण, जिसने खबर और प्रचार के बीच की सीमा को धुंधला कर दिया है?
लेकिन सवाल इससे भी बड़ा है। क्या पत्रकारिता का पतन सिर्फ पत्रकारिता का पतन है या यह पूरे समाज के बदलते चरित्र का आईना है?
पत्रकारिता समाज से ही निकलती है। पत्रकार भी इसी समाज का हिस्सा है। वह उसी व्यवस्था में रहता है, उसी बाजार को देखता है और उसी राजनीति के बीच काम करता है। ऐसे में अगर समाज की सोच बदल रही है तो पत्रकारिता उससे अछूती कैसे रह सकती है?
एक दौर था जब पत्रकार सत्ता के दरवाजे पर जाकर सवाल करता था। आज कई जगह पत्रकार यह पूछता दिखाई देता है कि साहब, खबर क्या लगानी है? पहले नेता पत्रकार के सवाल से डरता था, आज कई पत्रकार इस बात से डरते हैं कि सवाल पूछने पर विज्ञापन न रुक जाए, कोई नाराज न हो जाए या कोई फोन न आ जाए।
पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट शायद सेंसरशिप नहीं, बल्कि स्वयं-सेंसरशिप है। जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले यह सोचने लगे कि सामने वाला कौन है, किस पार्टी से जुड़ा है और सवाल पूछने से उसे क्या नुकसान होगा, तब कलम हाथ में रह जाती है, लेकिन पत्रकारिता पीछे छूट जाती है।
आज खबरें भी दो खेमों में बंटती दिखाई देती हैं—एक वह जो सत्ता को पसंद आए और दूसरी वह जो विरोधियों को पसंद आए। बीच में जो सच है, वह पूछ रहा है कि मुझे कौन दिखाएगा?
पत्रकारिता का काम किसी सरकार की आरती उतारना नहीं है, लेकिन हर बात में सरकार को गाली देना भी पत्रकारिता नहीं है। विपक्ष का प्रचार करना भी पत्रकारिता नहीं है और सरकारी प्रेस नोट को बिना जांचे खबर बना देना भी नहीं।
पत्रकारिता का काम है सवाल।
सवाल सत्ता से हो, विपक्ष से हो, अफसर से हो, माफिया से हो, पत्रकार से हो और जरूरत पड़े तो खुद से भी हो।
लेकिन आज सवाल भी राजनीतिक हो गया है। सरकार से सवाल करो तो सरकार विरोधी, विपक्ष से सवाल करो तो सरकार समर्थक और दोनों से सवाल करो तो पूछा जाता है—आप किसके आदमी हैं?
यही सबसे बड़ा संक्रमण है।
समाज ने पत्रकार को पत्रकार के रूप में देखना कम कर दिया है। खबर पढ़ने से पहले लोग यह खोजने लगते हैं कि पत्रकार किस खेमे से जुड़ा है। सच क्या है, यह बाद में पूछा जाता है। इसलिए यह सिर्फ पत्रकारिता की बीमारी नहीं, समाज की बीमारी भी है।
सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को संभावित पत्रकार बना दिया है। मोबाइल, कैमरा और इंटरनेट ने खबर पहुंचाने की ताकत आम लोगों के हाथ में दे दी है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ी ताकत है, लेकिन बिना सत्यापन के यही ताकत अफवाह को खबर और झूठ को सच बना सकती है।
अब कई बार खबर पहले वायरल होती है और सत्यापन बाद में।
जनता भी इसके लिए पूरी तरह निर्दोष नहीं है। जिस खबर से उसकी राजनीतिक भावनाएं संतुष्ट होती हैं, उसे वह बिना जांचे शेयर कर देती है। विरोधी पक्ष से जुड़ी खबर हो तो केवल इसलिए सच मान ली जाती है क्योंकि वह उसके पसंदीदा व्हाट्सऐप ग्रुप में आई है।
यानी आज हर व्यक्ति अपनी पसंद का सत्य लेकर घूम रहा है।
फिर पत्रकारिता अकेली दोषी कैसे हो सकती है?
हाँ, पत्रकारिता को अपने भीतर भी झांकना होगा। पत्रकारिता आज मिशन के साथ-साथ उद्योग भी है। संस्थान चलाने के लिए पैसा चाहिए, पत्रकार को वेतन चाहिए और रिपोर्टिंग के लिए संसाधन चाहिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब विज्ञापन खबर की दिशा तय करने लगे, मालिक का कारोबारी हित संपादकीय निर्णय से बड़ा हो जाए और पत्रकार को यह बताया जाने लगे कि किसके खिलाफ नहीं लिखना है।
तब सवाल उठता है—क्या हम पत्रकारिता कर रहे हैं या सिर्फ मैनेजमेंट?
यह सवाल छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर भी लागू होता है। आज पत्रकारिता के नाम पर हजारों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चल रहे हैं। कुछ शानदार काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ ने पत्रकारिता को सनसनी, आरोप और वायरल वीडियो का पर्याय बना दिया है।
किसी पर आरोप लगाना आसान है। तस्वीर लगाकर सवाल पूछना आसान है। लेकिन दस्तावेज खोजना, तथ्यों की पुष्टि करना, दोनों पक्षों को सुनना और फिर खबर प्रकाशित करना कठिन है।
यही कठिन काम पत्रकारिता है।
बाकी सब कंटेंट हो सकता है।
हमें यह अंतर समझना होगा कि कंटेंट और पत्रकारिता एक चीज नहीं हैं। कंटेंट मनोरंजन कर सकता है, पत्रकारिता समाज को असहज कर सकती है। कंटेंट आपको वह दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं, जबकि पत्रकारिता कई बार वह दिखाती है जिसे आप देखना नहीं चाहते।
यही वजह है कि असली पत्रकारिता हमेशा आसान नहीं होती।
सच्चा पत्रकार कई बार अकेला होता है। सत्ता नाराज हो सकती है, विपक्ष नाराज हो सकता है, विज्ञापनदाता नाराज हो सकता है और कभी-कभी अपने साथी भी नाराज हो सकते हैं। लेकिन अगर वह तथ्य और सच के साथ खड़ा है, तो पत्रकारिता जीवित है।
आज जरूरत पत्रकारिता को आईसीयू से बाहर निकालने की है। लेकिन इसके लिए सिर्फ पत्रकारों को दोष देने से काम नहीं चलेगा।
सत्ता को समझना होगा कि आलोचना लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी ऑक्सीजन है। मीडिया मालिकों को समझना होगा कि आर्थिक मजबूती जरूरी है, लेकिन संपादकीय स्वतंत्रता उससे भी ज्यादा जरूरी है। पत्रकारों को समझना होगा कि सुविधा और स्वतंत्रता हमेशा साथ नहीं चलतीं।
और पाठकों को भी तय करना होगा कि उन्हें सच चाहिए या सिर्फ अपनी पसंद की खबर।
क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य केवल पत्रकारों के हाथ में नहीं है। वह पाठकों के हाथ में भी है।
जिस समाज में लोग सवाल पूछना बंद कर देंगे, वहां पत्रकारिता धीरे-धीरे कमजोर होती जाएगी। लेकिन जिस समाज में लोग सवाल पूछते रहेंगे, वहां पत्रकारिता को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल होगा।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि पत्रकारिता आईसीयू में है या नहीं।
सवाल यह होना चाहिए कि क्या समाज पत्रकारिता को आईसीयू से बाहर निकालना चाहता है?
अगर हाँ, तो पत्रकार को अपनी कलम फिर उठानी होगी। सत्ता से सवाल करना होगा, माफिया से सवाल करना होगा, अफसर से सवाल करना होगा, मालिक से सवाल करना होगा और जरूरत पड़े तो खुद पत्रकार बिरादरी से भी सवाल करना होगा।
क्योंकि पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसका कैमरा, वेबसाइट, चैनल या लाखों फॉलोअर्स नहीं हैं।
उसकी असली ताकत है—विश्वसनीयता।
जिस दिन जनता को लगेगा कि पत्रकार की कलम बिकती नहीं है, उस दिन पत्रकारिता फिर खड़ी हो जाएगी। लेकिन जिस दिन जनता को लगने लगेगा कि खबर भी बिकती है, सवाल भी बिकता है और पत्रकार भी बिकता है, उस दिन आईसीयू में सिर्फ पत्रकारिता नहीं होगी—लोकतंत्र भी होगा।
इसलिए फैसला करना होगा—
कलम सत्ता के दरबार में बैठेगी या जनता के बीच?
पत्रकार सवाल पूछेगा या सवालों से बचने के बहाने ढूंढेगा?
खबर सच बताएगी या सिर्फ वही दिखाएगी जो बिक सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या हम पत्रकारिता को बचाना चाहते हैं या सिर्फ उसकी मौत पर शोकसभा करना चाहते हैं?
क्योंकि पत्रकारिता अभी आईसीयू में है तो शायद इलाज संभव है। लेकिन अगर हमने सवाल पूछना छोड़ दिया, तो अगली खबर शायद यह होगी कि लोकतंत्र की पत्रकारिता ने आखिरी सांस ले ली।
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