कुपात्र को ज्ञान देने से ज्ञानदाता की भी दुर्गति होती है : मुनि पुगव सुधासागर जी महाराज
गुना (आरएनआई) आज स्वाध्याय करना आसान है अतीत को देखे तो स्वाध्याय के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया है। कभी भी अपात्र को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि ऐसा किया तो ज्ञान देने बाले की भी दुर्गति होती है। यह उद्गार श्रुत पंचमी के दिन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य जगत पूज्य मुनिश्री पुगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुयें व्यक्त किए है।


मुनिश्री ने कहा आज स्वाध्याय करना आसान है यदि हम अतीत को देखे तो स्वाध्याय करना कठिन था। उन्हीं अकलंक और निकलंक का उदाहरण देते हुए कहा कि अतीत में स्वाध्याय करना कठिन था इस कारण निकालंक देव को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा था।मुनिश्री ने कहा स्वाध्याय अथवा ग्रन्थ के वाचन से ज्ञान का क्षयोपसम होता है अतः सभी को ग्रन्थ पढ़ना या सुनना चाहिए। भले ही कुछ समझ में न आवे तब भी स्वाध्याय करना चाहिए। उन्होंने अंजन चोर का उदाहरण की उसे णमोकार मंत्र का ज्ञान नहीं था मात्र श्रद्धान था और वह निरंजन बन गए है। मुनि श्री ने कहा सामान्य पढ़ना अलग बात है परंतु गुरु जो ज्ञान देते है वह अलग बात होती है गुरु ज्ञान उसे देते है जो धवल हो, विनयवाण हो, शीलगुणी हो, तृप्त हो, संपूर्ण कलाओं में पारंगत हो तभी ज्ञान देना चाहिए ।कभी भी किसी कुपात्र को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि कुपात्र को ज्ञान दिया तो उसकी दुर्गती होना निश्चित है। आज श्रुत पंचमी है। आज ही के दिन ग्रन्थराज षट्खण्डागम को लिपिबद्ध किया गया था।
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