लाल किले पर गूंजा ‘वंदे मातरम्’, 120 साल पुरानी कहानी फिर हुई याद; कभी बच्चों से वसूला गया था जुर्माना
नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम्’ का गायन हुआ। इस ऐतिहासिक मौके ने करीब 150 साल पुराने इस राष्ट्रीय गीत के उस दौर की यादें भी ताजा कर दीं, जब यही गीत अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया था।

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को की थी। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। 1896 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया।

1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध का प्रमुख नारा बन गया। बंगाल के रंगपुर में नवंबर 1905 में एक स्कूल के करीब 200 बच्चों पर ‘वंदे मातरम्’ बोलने के लिए पांच-पांच रुपये का जुर्माना लगाए जाने का उल्लेख मिलता है। उस दौर में यह रकम काफी बड़ी मानी जाती थी।

इसके बाद बरिसाल और लाहौर समेत कई स्थानों पर भी ‘वंदे मातरम्’ के नारे लगाने वाले लोगों को ब्रिटिश प्रशासन के विरोध और दमन का सामना करना पड़ा। इस तरह यह गीत धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बन गया।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 1838 में बंगाल के कांठालपाड़ा में हुआ था। वे सरकारी सेवा में डिप्टी मजिस्ट्रेट रहे और साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने बांग्ला उपन्यास को नई दिशा दी। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दुर्गेशनंदिनी’, ‘कपालकुंडला’, ‘विषवृक्ष’ और ‘आनंदमठ’ शामिल हैं। 1894 में उनका निधन हो गया। आजादी मिलने से कई दशक पहले ही उनका निधन हो चुका था, इसलिए वे ‘वंदे मातरम्’ के स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक प्रभाव को अपनी आंखों से नहीं देख सके।


12 अगस्त को बंगाल के नैहाटी स्थित बंकिमचंद्र के पैतृक आवास पर भारतीय सेना की पूर्वी कमान के बैंड ने ‘वंदे मातरम्’ की धुन बजाई थी। इस दौरान बंकिमचंद्र के वंशज और स्थानीय लोग भी मौजूद रहे।

1950 में संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। वहीं, 15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस समारोह में पहली बार लाल किले की प्राचीर से इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से पहले गाया गया।

एक तरफ आज लाल किले पर इस गीत पर फूलों की बारिश हुई, वहीं इतिहास में कभी इसी गीत को बोलने पर बच्चों पर जुर्माना लगाया गया था। यही बदलाव ‘वंदे मातरम्’ की उस लंबी यात्रा को दिखाता है, जिसमें एक कविता धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज और फिर राष्ट्र के राष्ट्रीय गीत का दर्जा पाने तक पहुंची।
राहुल मिश्रा
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