संवैधानिक पदों की गरिमा और राष्ट्रीय समारोहों में प्रोटोकॉल पर उठे सवाल
शैलेन्द्र कुमार बिराणी
भारत के मुख्य न्यायाधीश का हर वर्ष डंके की चोट पर खुलम खुला राष्ट्रीय अपमान करा जाता हैं तब बार काउन्सिल ऑफ इंडिया सहित देशभर के तमाम बार काउन्सिल व सुप्रीम कोर्ट बार काउन्सिल अपना मुंह छिपाकर दुबककर बैठे रहते हैं| मुख्य न्यायाधीश की संवैधानिक कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति भी काकरोच की भांति सच के प्रकाश से भागकर अंधेरे में दुबककर छुप जाता है और उल्टा देश के भविष्य युवा पीढ़ी को काकरोच कहकर अपना गुस्सा अशोक स्तंभ वाले शेर की तरह नहीं कागजी शेर दिखाकर निकालता है|
वर्तमान में नेशनल एकेडमी आफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने 2026 के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को चीफ गेस्ट बनाए जाने का विरोध किया तो बार काउन्सिल ऑफ इंडिया ने एक सर्कुलर निकाल सभी राज्यों के बार काउन्सिल को हैदराबाद की इस यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट को वकील के तौर पर एनरोलमेंट रोकने को कहा | इसके पश्चात् गैर-कानूनी कदम होने से विवाद बढ़ने पर रातोंरात इससे पीछे हटना पड़ा और सुबह मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यूनिवर्सिटी के किसी छात्र और फैकल्टी के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही न करने का आदेश व नोटिस जारी करके सबकुछ पुरा हो जाने पर कागजी शेर की तरह दहाड़ा|
भारतीय गणतंत्र व राष्ट्रीय व्यवस्था का कटु सत्य यह हैं कि 26 जनवरी के दिन राष्ट्र अपना गणतंत्र दिवस बनता हैं और राष्ट्रपति के नेतृत्व में शहीदों को श्रद्धांजलि देकर वीर जवानों, वीरता पुरस्कार विजेता युवाओं, छात्रों, जो जेन जी श्रेणी का हिस्सा होते हैं व राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त प्रतिभाशालीयों को राष्ट्रीय सलामी दी जाती हैं| यह राष्ट्रीय सलामी मंच से राष्ट्रपति के नेतृत्व में दी जाती हैं|
इस मंच पर राष्ट्रपति महोदय व उनसे शपथ लेकर दायित्व व शक्तियां प्राप्त करने वाले उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री मंच पर ऊपर बैठते हैं लेकिन राष्ट्रपति को शपथ दिलाने व शक्तियां देने वाला व उनसे शपथ लेने वाले लोकतन्त्र के न्यायपालिका वाले स्तम्भ के प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश को मंच से नीचे बैठाया जाता हैं और संवैधानिक पद की खुल्लमखुल्ला धज्जियां उड़ाई जाती हैं| देश के वीरों, जवानों ने तन-मन-धन देश के लिए न्यौछावर कर दिया उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से सलामी नहीं देंगे तो देशवासियों को संदेह होता हैं कि वो शहीदों के परिवार वालों व शहीद का जज्बा रखने वाले देशवासियों को कैसा व कब न्याय देंगे|
पन्द्रह अगस्त को स्वतंत्रता दिवस बनाया जाता हैं और प्रधानमंत्री लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र के नाम सन्देश देते हैं| संविधान में ऐसा करने की कोई बात नहीं लिखी गई हैं लेकिन आजादी के बाद से एक परम्परा बन गई हैं| इस कार्यक्रम में संवैधानिक पद की मर्यादा के अनुरूप राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति उपस्थिति दर्ज़ नहीं कराते और लोकसभा अध्यक्ष जिन्हें पद की मर्यादा के अनुरूप प्रदर्शन को सर कहना पड़ता है वो भी संविधान व पद की मर्यादा की धज्जियां उड़ाकर नीचे बैठे जाते हैं| राष्ट्रपति को शपथ दिलाने वाले मुख्य न्यायाधीश भी दुबककर वहां नीचे बैठ जाते हैं| निचले स्तर का संवैधानिक पद वाला व्यक्ति मंच के ऊपर से राष्ट्रीय सम्बोद्धन करता हैं और बड़े पद वाले व्यक्ति नीचे चुपचाप बैठ सारी मान मर्यादा व प्रतिष्ठता को तार-तार करते हैं| अब असली काॅकरोच कौन हुआ?
हमने यह सच्चाई महामहिम राष्ट्रपति महोदय को लिखित में दी उन्होंने कार्यवाही करते हुए दोनों राष्ट्रीय पर्व की व्यवस्था करने वाले गृहमंत्रालय के सचिव को कार्यवाही के लिए भेजा परन्तु उन्होंने राष्ट्रपति के आदेश को तवज्जो तक नहीं दी | हमने यह जानकारी दस्तावेज के साथ उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रीय न्यायीक आयोग के माध्यम से उसके संरक्षक भारत के मुख्य न्यायाधीश, हर राज्य के उच्चतम न्यायालय और बार काउन्सिल ऑफ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट बार काउन्सिल सहित हर बार काउन्सिल को भेजा परन्तु सभी काकरोचो की भांति दुबककर अंधेरे में छुप गये और न्यायपालिका के चीर-हरण को खुली आंखों से देखते हैं व आंखों की पट्टी हटी न्याय की देवी को भी दिखाते हैं|
यदि माना जाये की भारत के मुख्य न्यायाधीश संवैधानिक पद की मर्यादा के सम्मान में जाकर मंच से नीचे बैठते हैं तो जब उच्चतम न्यायालय संविधान दिवस बनाया है तो राष्ट्रपति महोदय उसमें उपस्थिति दर्ज कराके उसे राष्ट्रीय मान्यता देते हैं तब राज्यसभा व लोकसभा के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और संसद के दुसरे सदस्य अलग ही संविधान दिवस बना न्यायपालिका की ईज्जत, मान-मर्यादा, अधिकारों की खुल्लेआम धज्जियां उड़ाते हैं तब न्यायपालिका से जुड़े सभी लोग व देश की सभी बार काउन्सिल दुबककर कौनसे अंधेरे में दुम दुबाकर घुस जाते हैं| अब देश के भविष्य युवाओं पर कानूनी रूप से पाबंदियां नहीं लगा बल्कि गला घोट शेर बनने की कोशिश कर रहे हैं
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