छाता शुगर मिल: किसानों की पीड़ा या 2027 की चुनावी वैतरणी?
छाता शुगर मिल का बंद पड़ा गेट एक बार फिर चर्चा में है। मिल चालू कराने की मांग को लेकर धरना और अनशन शुरू हो चुके हैं। 13 अगस्त को पूर्व सैनिक परिषद ने भी मिल चालू कराने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। इससे पहले 10 अगस्त से किसानों के नाम पर सात दिवसीय रात्रिकालीन अनशन शुरू किए जाने की खबर सामने आई थी।
मिल चालू होनी चाहिए या नहीं, इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती। अगर मिल दोबारा शुरू होती है तो गन्ना किसानों को स्थानीय बाजार मिलेगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। लेकिन सवाल यह है कि आज मिल के लिए सबसे ज्यादा आवाज उठाने वाले लोग अपनी पिछली सरकारों के कार्यकाल का हिसाब भी जनता के सामने रखेंगे या नहीं?
छाता शुगर मिल 2009 में गन्ने की कमी और लगातार घाटे के कारण बंद हुई थी। इसके बाद डेढ़ दशक से अधिक समय बीत गया, सरकारें और राजनीतिक चेहरे बदलते रहे, लेकिन मिल दोबारा शुरू नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आज अचानक मिल का मुद्दा इतना बड़ा क्यों बन गया? क्या वजह 2027 का विधानसभा चुनाव तो नहीं?
मिल के नाम पर राजनीति करने वालों से जनता पूछ सकती है कि आंदोलन में कितने वास्तविक गन्ना किसान शामिल हैं? कितने किसानों ने बताया है कि मिल शुरू होने पर वे कितने क्षेत्र में गन्ने की खेती करेंगे? कितने गांवों में गन्ना उत्पादन का सर्वे हुआ है और किसानों को गन्ने की बिक्री तथा भुगतान की क्या गारंटी दी जा रही है?
क्योंकि सिर्फ मिल का गेट खोलना काफी नहीं है। मिल चलाने के लिए पर्याप्त गन्ना, आधुनिक मशीनरी, पूंजी निवेश, परिवहन व्यवस्था और किसानों को समय पर भुगतान की व्यवस्था भी जरूरी है।
पुरानी मिल की स्थिति भी एक बड़ा सवाल है। समय के साथ मशीनरी और आधारभूत ढांचा काफी प्रभावित हुआ है। ऐसे में अब मुद्दा केवल पुरानी मिल का ताला खोलने का नहीं, बल्कि नई तकनीक, मशीनरी, निवेश, डीपीआर, टेंडर और संचालन की पूरी योजना तैयार करने का है।
अगर नई मिल या लॉजिस्टिक हब की योजना बन चुकी है तो जनता जानना चाहती है कि डीपीआर कहां पहुंची? टेंडर कब होगा? निर्माण कब शुरू होगा? पहला पेराई सत्र कब शुरू होगा? सरकार इन सवालों का स्पष्ट जवाब कब देगी?
राजनीति करनी है तो रिपोर्ट कार्ड भी खोलना होगा
आज जो नेता और राजनीतिक दल मिल के लिए आंदोलन कर रहे हैं, जनता उनसे यह पूछने का अधिकार रखती है कि जब उनकी सरकार सत्ता में थी, तब उन्होंने क्या किया? कितनी बार मुद्दा विधानसभा में उठाया? कितनी बैठकें कीं? कितनी धनराशि स्वीकृत कराई? कौन-सी डीपीआर तैयार कराई और उसका परिणाम क्या निकला?
छाता का किसान किसी राजनीतिक दल का हथियार या केवल चुनावी मुद्दा नहीं है। किसान की वास्तविक समस्या का समाधान तभी होगा, जब उसके खेत में गन्ने की खेती दोबारा बढ़ेगी, उसे स्थानीय मिल मिलेगी और उसकी उपज का समय पर उचित भुगतान होगा।
छाता की जनता को ऐसी मिल चाहिए जो सिर्फ चुनाव से पहले कागजों पर शुरू न हो, बल्कि लंबे समय तक चले। इसके लिए समयबद्ध योजना, स्पष्ट बजट, निर्धारित निर्माण अवधि, पर्याप्त गन्ना क्षेत्र और किसानों के भुगतान की मजबूत व्यवस्था जरूरी है।
अब जनता को नारे नहीं, हिसाब चाहिए। मिल जरूर चले, किसान जरूर जीते और छाता का विकास जरूर हो। लेकिन किसान की पीड़ा को केवल चुनावी पोस्टर का हिस्सा बनाकर राजनीति की जाए, यह सवाल जनता जरूर पूछेगी।
सवाल सीधा है—मिल के नाम पर किसानों की लड़ाई लड़ी जा रही है या 2027 की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए राजनीतिक नाव तैयार की जा रही है?
किसान को भाषण नहीं, गन्ने का भाव चाहिए। फोटो नहीं, मिल चाहिए। वादे नहीं, पेराई चाहिए। और चुनावी नारों की चाशनी नहीं, मिल की चिमनी से निकलता हुआ असली धुआं चाहिए।
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