श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद में नया मोड़, RTI में वक्फ बोर्ड ने ईदगाह को वक्फ संपत्ति नहीं बताया; 18 अगस्त को सुनवाई
मथुरा। श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही मस्जिद ईदगाह विवाद में हिंदू पक्ष ने मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर नया नक्शा अदालत में दाखिल करने की तैयारी की है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष और पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार, यह नक्शा 1670 के ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुराने चित्रों और सूचना का अधिकार (RTI) के तहत वक्फ बोर्ड से मिली जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।
हिंदू पक्ष का दावा है कि 1670 से पहले विवादित भूमि पर शाही मस्जिद ईदगाह का अस्तित्व दर्ज नहीं था। उनके अनुसार, उस समय वहां कटरा केशवदेव मंदिर और मूल गर्भगृह का उल्लेख मिलता है। पक्ष का कहना है कि मुगल शासक औरंगजेब ने 1670 में प्राचीन केशवदेव मंदिर को ध्वस्त कराया था। इसके लिए ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ को ऐतिहासिक स्रोत के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। इस फारसी ग्रंथ की रचना मुहम्मद साकी मुस्तैद खान ने की थी।
हिंदू पक्ष ने वक्फ बोर्ड से भी इस संपत्ति से जुड़ी जानकारी मांगी थी। महेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, 2024 में RTI के जवाब में वक्फ बोर्ड ने शाही मस्जिद ईदगाह को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं बताया। हिंदू पक्ष का दावा है कि इससे संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, इस जानकारी की कानूनी व्याख्या और संपत्ति के वास्तविक मालिकाना हक का अंतिम निर्धारण अदालत ही करेगी।
मामले की सुनवाई मथुरा जिला न्यायालय में चल रही है और अगली सुनवाई 18 अगस्त को निर्धारित है। इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी इससे संबंधित एक मामला लंबित है।
विवादित भूमि को लेकर हिंदू पक्ष ने 1832 के एक पुराने कानूनी मामले का भी हवाला दिया है। उनके अनुसार, 15 मार्च 1832 को कटरा केशवदेव की जमीन से संबंधित मामला ईस्ट इंडिया कंपनी की नीलामी को चुनौती देते हुए दायर किया गया था। वहीं, 12 अक्टूबर 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच एक समझौता हुआ था। हिंदू पक्ष के अनुसार, इस समझौते के तहत विवादित भूमि के कुछ हिस्से को ईदगाह के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी।
अब 18 अगस्त की सुनवाई में पेश किए जाने वाले नए दस्तावेज और नक्शे पर अदालत का रुख महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विवाद में जमीन के स्वामित्व, पुराने दस्तावेजों और 1968 के समझौते की कानूनी स्थिति जैसे मुद्दे आगे की सुनवाई में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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