दो तरह के गायक: एक जिन्हें मनाने पर भी माइक नहीं मिलता, दूसरे जो माइक मिलते ही महफिल पर कब्जा कर लेते हैं
समाज में मोटे तौर पर दो तरह के गायक पाए जाते हैं। पहले वे, जिन्हें गाना गाने के लिए लोग मिन्नतें करते हैं—“प्लीज, वही वाला गाना एक बार फिर गा दीजिए!” ऐसे गायक कम होते हैं। वे गाने से पहले थोड़ा भाव खाते हैं, गला खराब होने का बहाना बनाते हैं और कोशिश करते हैं कि किसी तरह माइक से बचा जा सके। लेकिन जब आखिरकार गाते हैं, तो पूरी महफिल में संगीत की रूहानियत भर देते हैं।
दूसरे वे स्वघोषित गायक होते हैं, जिन्हें गाने के लिए किसी आग्रह की जरूरत नहीं पड़ती। इनके लिए गाना गाना किसी रोजमर्रा की अनिवार्य क्रिया जैसा है। ऑफिस हो, बस हो, ट्रेन हो या पिकनिक वैन—बस हाथ में माइक और आसपास कुछ बेकसूर श्रोता होने चाहिए। फिर शुरू होता है ऐसा सुरमयी तूफान, जिसमें बाकी लोग न आपस में बात कर पाते हैं, न मोबाइल चला पाते हैं। वे चुपचाप इस संगीत यात्रा को सहते रहते हैं, मानो यह उनके पुराने कर्मों का हिसाब हो।
इन स्वघोषित गायकों के लिए जगह और माहौल का भी कोई महत्व नहीं होता। प्राकृतिक स्थल हो, पर्यटन केंद्र हो, परिवार की हल्दी-मेहंदी हो या कोई दूसरा कार्यक्रम—ब्लूटूथ स्पीकर कनेक्ट होते ही इनके भीतर का कलाकार जाग उठता है। अगर दुर्भाग्य से ऐसा गायक आपका बॉस या कंपनी का मालिक निकल जाए, तो उसके हर बेसुरे आलाप पर तालियां बजाना और “वाह, क्या दर्द है!” कहना आपके पेशेवर जीवन की मजबूरी बन सकता है।
एक बार किसी व्यक्ति को यह विश्वास हो जाए कि वह महान गायक है, तो फिर संगीत उसके व्यवहार का स्थायी हिस्सा बन जाता है। सामान्य बातचीत के बीच भी अचानक आलाप शुरू हो सकता है। सब्जीवाले से धनिया मांगते समय भी स्वर में उतार-चढ़ाव आने लगता है। माइक हाथ में आते ही ऐसा लगता है जैसे उसके भीतर कई महान गायकों की आत्माएं एक साथ जाग उठी हों। आंखें बड़ी, माथे की नसें तन जाती हैं और हाथ-पैरों की गतिविधियां ऐसी हो जाती हैं जैसे मंच पर नहीं, किसी बड़े संगीत समारोह में प्रस्तुति दी जा रही हो।
यहीं से शुरू होता है आधुनिक कराओके गायन का दर्शन।
कराओके ने संगीत को लोकतांत्रिक जरूर बनाया, लेकिन इसके साथ सुरों की स्वतंत्रता भी लगभग निरंकुश हो गई। स्क्रीन पर पीली और नीली पट्टियां चलती रहती हैं, चाहे गायक की आवाज किसी भी दिशा में जा रही हो। कराओके का पहला सिद्धांत शायद यही है कि सुर मिले या न मिले, ट्रैक रुकना नहीं चाहिए।
स्क्रीन पर शब्द आगे बढ़ते हैं और गायक को लगता है कि संगीत की सारी साधना उन्हीं शब्दों के पीछे छिपी हुई है। गाना कुछ और कह रहा होता है, लेकिन प्रस्तुति ऐसी होती है जैसे गायक किसी आपातकालीन स्थिति में मदद के लिए पुकार रहा हो।
दरअसल, कराओके केवल आवाज का नहीं, आत्मविश्वास का खेल है। कई बार सुर की समझ जितनी कम होती है, माइक पर पकड़ उतनी ही मजबूत होती है। और जब पूरा प्रदर्शन समाप्त होने के बाद गायक मुस्कुराकर आपसे पूछता है, “कैसा लगा?”, तब आपके सामने सबसे कठिन सामाजिक प्रश्न खड़ा हो जाता है।
ऐसे समय में “लाजवाब!” कहना ही शायद सबसे सुरक्षित उत्तर होता है।
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