कामाख्या ध्यान एवं स्तोत्र: सर्वकामेश्वरी के दिव्य रूप का वर्णन

Oct 4, 2025 - 13:03
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कामाख्या ध्यान एवं स्तोत्र: सर्वकामेश्वरी के दिव्य रूप का वर्णन

गुवाहाटी (आरएनआई) हिन्दू धर्म में देवी कामाख्या को कामेश्वरी / कामरूपेश्वरी के नाम से जाना जाता है। अब भक्तों के लिए विशेष ध्यान और स्तोत्र का प्रकाशन किया गया है।

ध्यान और स्तोत्र में क्या है खास?

कामाख्या ध्यानं: इस ध्यान में देवी के दिव्य स्वरूप का वर्णन है। इसे पढ़ते या ध्यान करते समय भक्त की मनःशांति, भक्ति और संकल्प शक्ति बढ़ती है। ध्यान में देवी की त्रिनेत्री, लोल जिह्वा, अभय वरदहस्ता, रक्तपद्मासन जैसी विशेषताएँ बताई गई हैं।

कामाख्या स्तोत्रम्: देवी की स्तुति में कहा गया है —

“जय कामेशि चामुण्डे, जय भूतापहारिणि, जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते।”

स्तोत्र में देवी के भीमरूप, महाकाली, भूतनाथ, कामरूपिणी रूप का वर्णन है।

भक्त इसे पढ़कर सर्वकामों की पूर्ति, भय का नाश और मोक्ष प्राप्त करने की कामना कर सकते हैं।

श्रीकामाख्याध्यानं च स्तोत्रं!!
।।कामाख्या ध्यानम्।। 
रविशशियुतकर्णा कुंकुमापीतवर्णा
मणिकनकविचित्रा लोलजिह्वा त्रिनेत्रा ।
अभयवरदहस्ता साक्षसूत्रप्रहस्ता
प्रणतसुरनरेशा सिद्धकामेश्वरी सा ॥१॥
अरुणकमलसंस्था रक्तपद्मासनस्था
नवतरुणशरीरा मुक्तकेशी सुहारा ।
शवहृदि पृथुतुङ्गा स्वाङ्घ्रियुग्मा मनोज्ञा
शिशुरविसमवस्त्रा सर्वकामेश्वरी सा॥ २॥
विपुलविभवदात्री स्मेरवक्त्रा सुकेशी
दलितकरकदन्ता सामिचन्द्रावतंसा ।
मनसिज-दृशदिस्था योनिमुद्रालसन्ती
पवनगगनसक्ता संश्रुतस्थानभागा ।
चिन्ता चैवं दीप्यदग्निप्रकाशा
धर्मार्थाद्यैः साधकैर्वाञ्छितार्था॥३॥
           ।।कामाख्या स्तोत्रम्।। 
जय कामेशि चामुण्डे जय भूतापहारिणि।
जय सर्वगते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१॥
विश्वमूर्ते शुभे शुद्धे विरूपाक्षि त्रिलोचने।
भीमरूपे शिवे विद्ये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥२॥
मालाजये जये जम्भे भूताक्षि क्षुभितेऽक्षये।
महामाये महेशानि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥३॥
भीमाक्षि भीषणे देवि सर्वभूतभयङ्करि।
करालि विकरालि च कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥४॥
कालि करालविक्रान्ते कामेश्वरि हरप्रिये।
सर्वशास्त्रसारभूते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥५॥
कामरूपप्रदीपे च नीलकूटनिवासिनि ।
निशुम्भ-शुम्भमथनि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥६॥
कामाख्ये कामरूपस्थे कामेश्वरि हरिप्रिये ।
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥७॥
वपानाढ्यमहावकत्रे तथा त्रिभुवनेश्वरि ।
महिषासुरवधे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥८॥
छागतुष्टे महाभीमे कामाख्ये सुरवन्दिते ।
जय कामप्रदे तुष्टे कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥९॥
भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः ।
अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यामुपवासी नरोत्तमः ॥१०॥
संवत्सरेण लभते राज्यं निष्कण्टकं पुनः।
य इदंश‍ृणुयाद् भक्त्या तव देवि समुद्भवम् ॥११॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति ।
श्रीकामरूपेश्वरि भास्करप्रभे प्रकाशिताम्भोजनिभायतानने ।
सुरारि-रक्षःस्तुतिपातनोत्सुके त्रयीमये देवनुते नमामि ॥१२॥
सितासिते रक्तपिशाङ्गविग्रहे रूपाणि यस्याः प्रतिभान्ति तानि ।
विकाररूपा च विकल्पितानि शुभाशुभानामपि तां नमामि ॥१३॥
कामरूपसमुद्भूते कामपीठावतंसके ।
विश्वाधारे महामाये कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१४॥
अव्यक्तविग्रहे शान्ते सन्तते कामरूपिणि ।
कालगम्ये परे शान्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१५॥
या सुषुम्नान्तरालस्था चिन्त्यते ज्योतिरूपिणि ।
प्रणतोऽस्मि परां धीरां कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१६॥
दंष्ट्राकरालवदने मुण्डमालोपशोभिते ।
सर्वतः सर्वगे देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥ १७॥
चामुण्डे च महाकालि कालि कपोलहारिणि ।
पाशहस्ते दण्डहस्ते कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१८॥
चामुण्डे कुलमालास्ये तीक्ष्णदंष्ट्रा महावले।
शवयानास्थिते देवि कामेश्वरि नमोऽस्तु ते ॥१९॥

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