पैकेज्ड फूड लेबलिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा- ‘क्या भारत को अविकसित देश बना रहना चाहिए?’

Saturday, August 15, 2026 - 17:55
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पैकेज्ड फूड लेबलिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा- ‘क्या भारत को अविकसित देश बना रहना चाहिए?’

नई दिल्ली। पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर पोषण संबंधी चेतावनी को स्पष्ट और प्रभावी बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ठोस कदम उठाने को कहा है। अदालत ने फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (एफओपीएल) के डिजाइन और उसमें इस्तेमाल होने वाले संकेतों को लेकर विशेषज्ञों की राय लेने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गुरुवार को जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र के रुख पर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि वह इस दलील को स्वीकार नहीं करती कि भारत के लिए विकसित देशों में लागू अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था बनाना संभव नहीं है।

अदालत ने कहा कि एफओपीएल उपभोक्ताओं को पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय पोषण संबंधी जानकारी समझने और बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकता है। पीठ ने विशेष रूप से बच्चों में बढ़ती जंक फूड की आदत और मोटापे को सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती बताते हुए चेतावनी वाले लेबल की जरूरत पर जोर दिया।

यह जनहित याचिका सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट ‘3एस एंड आवर हेल्थ सोसाइटी’ ने दायर की है। याचिका में केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर अनिवार्य एफओपीएल लागू करने की मांग की गई है।

एफएसएसएआई को भी लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर चेतावनी वाले लेबल लागू करने में देरी को लेकर भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को भी फटकार लगाई। पीठ ने कहा कि देश में मोटापे को पहले ही सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती के रूप में स्वीकार किया जा चुका है।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने कहा कि पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना मुश्किल होने के कारण एफओपीएल को लेकर अदालत के सुझाव पर अमल करना संभव नहीं है। इस पर न्यायमूर्ति पारदीवाला ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा, “क्या आप अदालत को मजाक समझ रहे हैं?”

चिली, इजरायल और कनाडा जैसे देशों में लागू व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि भारत को भी बेहतर अंतरराष्ट्रीय मानकों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। अदालत ने केंद्र के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि विकसित देशों के मानकों के अनुरूप चलना संभव नहीं है और सवाल किया, “क्या भारत को अविकसित देश बना रहना चाहिए?”

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