अदालत में वकालत पर सवाल, लखनऊ जिला अदालत में महिला अधिवक्ता से मारपीट के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
लखनऊ जिला अदालत परिसर में दिल्ली की अधिवक्ता अभिप्सा मोहंती के साथ कथित मारपीट का मामला अब न्यायिक व्यवस्था और अदालतों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। 21 जुलाई 2026 को अभिप्सा मोहंती अपने सहयोगी अधिवक्ताओं कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव के साथ एक दीवानी संपत्ति विवाद में पैरवी के लिए लखनऊ जिला अदालत पहुंची थीं। आरोप है कि वकालतनामा दाखिल करने के दौरान कुछ अधिवक्ताओं ने उन्हें और उनके सहयोगियों को अदालत में पैरवी करने से रोकने की कोशिश की और उनके साथ धक्का-मुक्की तथा मारपीट की गई।
आरोपों के मुताबिक, विवाद के दौरान उनके मुवक्किल के साथ भी मारपीट की गई। मामले की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि घटना अदालत परिसर के भीतर होने का आरोप है। अदालत वह स्थान है जहां विवादों का समाधान कानून और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। किसी पक्ष की पैरवी से असहमति होने पर उसका जवाब कानूनी तरीके से दिया जाना चाहिए, न कि कथित तौर पर मारपीट या दबाव के जरिए।
घटना के बाद अभिप्सा मोहंती और उनके सहयोगियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। हालांकि, तत्काल राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में मामला उठने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसी दिन विशेष सुनवाई की और मामले की गंभीरता को देखते हुए सीसीटीवी फुटेज मंगाने के साथ जिला जज तथा पुलिस आयुक्त से रिपोर्ट तलब की।
इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले में कार्रवाई आगे बढ़ाई और चार अधिवक्ताओं के जिला अदालत परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने की कार्रवाई की गई। घटनाक्रम के बाद यह सवाल भी सामने आया कि यदि अदालत परिसर में ही वकीलों के बीच विवाद मारपीट तक पहुंच जाए, तो आम वादकारियों की सुरक्षा और न्याय तक उनकी पहुंच किस तरह सुनिश्चित होगी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभिप्सा मोहंती स्वयं अधिवक्ता हैं और उन्हें कानून तथा न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी है। इसके बावजूद उन्हें न्याय के लिए जिला अदालत से हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। ऐसे में उस आम व्यक्ति की स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जिसके पास न कानूनी जानकारी है और न ही न्यायिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों तक आसानी से पहुंचने के साधन।
अदालतों से लोगों को कानून के शासन और निष्पक्ष न्याय की उम्मीद होती है। इसलिए अदालत परिसर में किसी भी तरह की कथित हिंसा या दबाव की घटना केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं रहती, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से भी जुड़ जाती है। इस मामले ने यही बड़ा सवाल खड़ा किया है कि अदालतों को ऐसा सुरक्षित और निष्पक्ष स्थान कैसे बनाया जाए, जहां वकील बिना दबाव के पैरवी कर सकें और आम नागरिक बिना भय के न्याय मांग सके।
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