सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: सरकारी नौकरी में ‘सहानुभूति’ नहीं, केवल नियम सर्वोपरि
नई दिल्ली: Supreme Court of India ने सरकारी भर्तियों को लेकर एक महत्वपूर्ण और सख्त संदेश देते हुए साफ कर दिया है कि किसी भी अभ्यर्थी को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर नियमों में छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने दो टूक कहा कि सार्वजनिक रोजगार में “दान या दया” की कोई जगह नहीं है और सभी उम्मीदवारों के लिए नियम समान रूप से लागू होने चाहिए।
यह टिप्पणी Delhi Police में कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान आई। मामले में अभ्यर्थी उत्तम कुमार शारीरिक दक्षता और माप परीक्षण की तय तारीख पर उपस्थित नहीं हुआ था। बाद में उसने सर्दी-जुकाम को कारण बताते हुए दोबारा मौका देने की मांग की, जिसे पहले Central Administrative Tribunal और फिर Delhi High Court ने सहानुभूति के आधार पर स्वीकार कर लिया था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे, ने इन दोनों फैसलों को पलटते हुए स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया में तय नियमों का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि यदि नियमों में यह स्पष्ट है कि किसी चरण के लिए दूसरा अवसर नहीं मिलेगा, तो यह शर्त सभी पर समान रूप से लागू होगी, चाहे कोई किसी भी वर्ग से आता हो।
अदालत ने यह भी कहा कि निर्धारित समय पर उपस्थित न होना उम्मीदवार की लापरवाही और नौकरी के प्रति गंभीरता की कमी को दर्शाता है। खासतौर पर पुलिस जैसी अनुशासित सेवा में ऐसे रवैये को स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि किसी एक उम्मीदवार को विशेष छूट देना अन्य योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने नियमों का पूरी तरह पालन किया है।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की अपील को स्वीकार करते हुए कैट और दिल्ली हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया और अभ्यर्थी को दोबारा मौका देने से इनकार कर दिया। यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता, समानता और अनुशासन ही सबसे ऊपर हैं।
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