सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: भाषण या फिल्मों के जरिए किसी समुदाय को निशाना बनाना असांविधानिक
नई दिल्ली (आरएनआई) — सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा है कि भाषण, फिल्मों, मीम, कार्टून या किसी भी दृश्य माध्यम के जरिए किसी समुदाय को बदनाम या अपमानित करना संविधान के मूल मूल्यों के खिलाफ है। अदालत ने रेखांकित किया कि बंधुता भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित एक अहम उद्देश्य है और इसे बनाए रखना हर नागरिक का कर्तव्य है।
नेटफ्लिक्स की फिल्म घूसखोर पंडत के शीर्षक को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने अपने अलग निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 51ए(ई) प्रत्येक नागरिक को यह जिम्मेदारी देता है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर भाईचारे और सद्भाव को बढ़ावा दे। किसी भी समुदाय को सामूहिक रूप से भ्रष्ट या अपमानजनक रूप में प्रस्तुत करना इस संवैधानिक भावना के विपरीत है।
अदालत ने साफ किया कि यह सिद्धांत खास तौर पर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों पर अधिक सख्ती से लागू होता है। मंत्री या अन्य उच्च संवैधानिक पदाधिकारी यदि धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाते हैं, तो यह सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन माना जाएगा, क्योंकि उन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली होती है।
हालांकि फिल्म निर्माताओं द्वारा शीर्षक बदल दिए जाने के बाद याचिका को औपचारिक रूप से बंद कर दिया गया, फिर भी पीठ ने यह स्पष्ट करना जरूरी समझा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ किसी समुदाय की गरिमा को ठेस पहुंचाने की छूट नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित करना असांविधानिक है और यह देश की सामाजिक एकता और सौहार्द के लिए भी खतरा पैदा करता है।
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