वृन्दावन की श्रीनाभापीठ सुदामा कुटी में चल रहे शताब्दी महोत्सव पर विशेष

आचार्य ऋषि कुमार तिवारी

Friday, January 16, 2026 - 20:00
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वृन्दावन की श्रीनाभापीठ सुदामा कुटी में चल रहे शताब्दी महोत्सव पर विशेष

कौन तपोबल से इस धरा को, हरि-भक्ति रस सिंचाय।

किस संत-चरण रज पावन से, वृन्दावन छवि पाय॥

युग पूछे उत्तर मौन हुआ, इतिहास शीश नवाय।

रामानंद परंपरा में, सुदामा दास कहाय॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

श्रीवैष्णव कुल-तिलक सुदामा, त्याग-तपस्या रूप।

भक्ति बनी जिनकी श्वास है, सेवा जिनकी धूप॥

निज आचरण से धर्म जगा, वाणी नहीं उपदेश।

हर कर्म में हरि वास था, यही बने संदेश॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

आए जब वृन्दावन धरा पर, बदली युग की चाल।

सुदामा कुटी प्रकट हुई, साधना का भाल॥

न मठ मात्र, न आश्रम था, जीवन दर्शन सार।

संत-विप्र-गो सेवा बनी, साक्षात् धर्म आधार॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

भगवान दास महाराज जी, सेवा पथ के दीप।

निरंतर साधना साधि कर, हरि को किया समीप॥

उनकी कृपा से जगत में, फैला हरि का मान।

संत परंपरा जीवित रही, बढ़ता गया विधान॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

सुतीक्षण स्वामी शिष्य शिरोमणि, सौम्यता अवतार।

वात्सल्य रस से सींच दी, कुटी की कीर्ति अपार॥

विश्व-विश्व में नाम भयो, करुणा बनी पहचान।

सहज स्वभाव, सरल हृदय, संतों की यही शान॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

कौशल किशोर भगवान ने, मंदिर भव्य बनाय।

प्राण-प्रतिष्ठा कराके, हरि को धाम बसाय॥

शताब्दी यज्ञ महोत्सव, अद्भुत वैदिक गान।

अष्टोत्तर शत कुण्डों में, गूँजा वेद विधान॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

सुतीक्षण दास कृपा सागर, बरसे प्रेम अपार।

अमरदास कृपा पात्र बने, सेवा के आधार॥

जगद्गुरु जयराम के कर से, धर्म धाम विस्तार।

संत-विद्वानों का समागम, ज्ञान ज्योति उजास॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

देश-देश से संत जन, विद्वान आए द्वार।

अर्चन-वंदन पूजन हुआ, बरसा प्रभु अपार॥

ऋषिदास गावे चरित यह, कृपा रहे दिन-रात।

राम-नाम रस में डूबे, कटे भव-भय पात॥

वृन्दावन धाम उजागर भयो, सुदामा कुटी महान।

संत-विप्र-गो सेवा बहे, वैदिक धर्म की शान॥

( लेखक हिंदी और संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान हैं)

आचार्य ऋषि कुमार तिवारी

रुक्मिणी विहार, वृन्दावन (मथुरा)

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