अघोर चतुर्दशी 2026: 10 सितंबर को मनाया जाएगा पर्व, जानें महत्व, पूजा-विधि और काशी के हरिश्चंद्र घाट से जुड़ी मान्यता
अघोर चतुर्दशी का पर्व वर्ष 2026 में गुरुवार, 10 सितंबर को मनाया जाएगा। भगवान शिव के अघोर स्वरूप की आराधना से जुड़ा यह दिन शिव भक्तों के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में ‘अघोर’ भगवान शिव के ऐसे स्वरूप का प्रतीक है, जो भय, द्वेष और नकारात्मकता से परे माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु शिव पूजा, अभिषेक, ध्यान और मंत्र जाप करते हैं।
अघोर चतुर्दशी कब मनाई जाएगी?
वर्ष 2026 में अघोर चतुर्दशी 10 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। पूजा का सटीक समय स्थानीय पंचांग के अनुसार देखना उचित रहेगा, क्योंकि तिथि और मुहूर्त में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है।
अघोर चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव का अघोर स्वरूप करुणा, निर्भयता और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन शिव आराधना के माध्यम से भय, नकारात्मक विचार और मानसिक अशांति से मुक्ति की कामना की जाती है। श्रद्धालु भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
काशी के हरिश्चंद्र घाट का क्या महत्व है?
काशी यानी वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट का भगवान शिव और सत्य की परंपरा से गहरा धार्मिक संबंध माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र ने सत्य की रक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया था। इसी कारण इस घाट का नाम हरिश्चंद्र घाट पड़ा। काशी में भगवान शिव की उपासना और मोक्ष की मान्यता के कारण यह स्थान विशेष धार्मिक महत्व रखता है।

अघोर परंपरा और काशी का संबंध भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है और यहां शिव साधना की अनेक परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। हरिश्चंद्र घाट समेत काशी के प्रमुख घाटों पर धार्मिक गतिविधियों और शिव आराधना का वातावरण देखने को मिलता है।
अघोर चतुर्दशी की पूजा-विधि
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान की सफाई करें। भगवान शिव का ध्यान कर पूजा का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग पर जल अर्पित करें और अपनी परंपरा के अनुसार दूध से अभिषेक करें। बेलपत्र, पुष्प, अक्षत और चंदन अर्पित करें। धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आरती करें। इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करते हुए परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्रार्थना करें।
अघोर स्वरूप कैसे बनाया जाता है?
अगर पूजा के लिए भगवान शिव का अघोर स्वरूप प्रतीकात्मक रूप से बनाना हो, तो साफ मिट्टी से शिवलिंग या भगवान शिव की सरल प्रतिमा बनाई जा सकती है। मिट्टी को पानी की सहायता से अच्छी तरह गूंथकर आकार दिया जाता है और फिर उसे सूखने दिया जाता है। हालांकि अघोर साधना से जुड़ी विशेष तांत्रिक विधियां अलग धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं, इसलिए घर पर सामान्य शिव पूजा और ध्यान करना ही उचित माना जाता है।
व्रत में क्या करें?
श्रद्धालु अपनी आस्था और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रख सकते हैं। कुछ लोग फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग उपवास रखते हैं। व्रत के दौरान पर्याप्त पानी पीना और अपनी स्वास्थ्य स्थिति का ध्यान रखना जरूरी है।
क्या करें और क्या न करें?
इस दिन भगवान शिव का ध्यान, पूजा, मंत्र जाप और जरूरतमंदों की सहायता जैसे धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं। श्रद्धालुओं को क्रोध, अहंकार और द्वेष से दूर रहने तथा शांत मन से भगवान शिव की आराधना करने की मान्यता है। पूजा और व्रत के नियम अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग हो सकते हैं।
अघोर चतुर्दशी पर काशी का धार्मिक वातावरण विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। भगवान शिव की नगरी काशी में हरिश्चंद्र घाट समेत विभिन्न घाटों और शिव मंदिरों में श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।
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