पंचायत चुनाव टालने पर हाईकोर्ट सख्त, ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के सरकारी आदेश पर रोक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टालने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने कहा कि जिन कानूनी प्रावधानों के आधार पर यह आदेश जारी किया गया, उन्हें पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 और 26 मई 2026 के उन सरकारी आदेशों को प्रभावहीन करार दिया, जिनके जरिए पंचायत चुनाव स्थगित किए गए थे। अदालत ने कहा कि ये आदेश उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) के तहत जारी किए गए थे, जबकि इस प्रावधान को पहले ही उच्च न्यायालय की खंडपीठ असंवैधानिक घोषित कर चुकी है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-के के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और समय पर चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है। राज्य सरकार ने ओबीसी आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को चुनाव में देरी का कारण बताया, जिस पर अदालत ने सवाल उठाते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आयोग की रिपोर्ट अब तक प्रस्तुत क्यों नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि 10 जून 2026 को मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है और आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से आवश्यक प्रशासनिक और लॉजिस्टिक सहयोग नहीं मिलने के कारण चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और पंचायत चुनाव कराने की स्पष्ट समय-सीमा बतानी होगी। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि यदि सरकार ऐसा करने में विफल रहती है तो 25 मई 2026 का आदेश जारी करने वाले संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा। ऐसा नहीं होने पर इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना माना जाएगा।
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