धर्मांतरण या मतांतरण या (राष्ट्रांतरण)पर मचा बबाल?
गुना (आरएनआई) जिले में धर्मांतरण (मतांतरण) को लेकर एक बार फिर बवाल मचा है। लेकिन ये कोई नई बात नहीं है। बमौरी विधानसभा क्षेत्र का ग्राम मोहनपुर पिछले 25 सालों से अधिक समय से ईसाई मिशनरीज की गतिविधियों का केंद्र है। यहां से कई बच्चे पढ़ाई के नाम पर बाहर भेजे गए। उनका मतांतरण हुआ। फिर वो भी इस मिशन को आगे बढ़ाने में जुट गए।
चंगाई सभाओं में पास्टर, यीशु मसीह के नाम पर चमत्कार से सब चंगा करने का दावा करने लगे। लेकिन सिर्फ इतने भर से ही मतांतरण नहीं हुआ। बल्कि मिशन से जुड़े कई लोगों ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देने का प्रयास किया, जिसकी पिछड़े इलाकों में जरूरत थी। इस कारण क्षेत्र में मिशनरीज की जड़े गहरी होती गईं, जिन्हें सिर्फ विरोध कर या हंगामा खड़ा कर रोकना मुश्किल था। कारण कि अनुसूचित जनजाति वर्ग का जो तबका धर्मांतरण करने वालों के निशाने पर है, वह खुद ही विरोध के लिए कभी सामने नहीं आता। इस कारण धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 भी लागू होने के बाद प्रभावी नहीं हो सका।
दरअसल, वर्ष 2000 से पहले ही गुना के ट्राइबल बेल्ट में ईसाई मिशनरीज टारगेट सेट कर एक्टिव हो गई थीं। बमौरी ब्लॉक में ग्राम मोहनपुर इसका केंद्र बना। इसके बाद आरएसएस ने इस क्षेत्र में समानांतर कार्य शुरू किए। दर्जनों एकल विद्यालय और तब एक वाहन में चलित अस्पताल की व्यवस्था की गई थी। 2003-2004 में धर्मजागरण अभियान चलाया गया। 450 से अधिक पूर्ण कालिक प्रभावित क्षेत्रों में भेजे गए। घर घर हनुमान जी की तस्वीरें वितरित की गईं। फिर जनजातीय गांवों से लोगों को गुना आमंत्रित कर फ्रेंड्स कॉलोनी के मैदान में कार्यक्रम हुआ जिसे तत्समय आरएसएस के माननीय सरकार्यवाह रहे मोहन भागवत जी ने संबोधित किया।। संगठन की योजना से तब गांववासी, शहरवासियों के घर मेहमान की तरह रुके थे।
इस अभियान के बाद मतांतरण की तेज गति पर ब्रेक लग गया था। 2006 के आसपास संगठन के कार्यकर्ताओं ने विशेष प्रयास कर मोहनपुर में मतांतरण की गतिविधियों में उपयोग की जा रही जमीन के गलत तरीके से आवंटित किए गए पट्टे भी निरस्त कराए थे। तत्कालीन तहसीलदार वीरेंद्र कटारे और कलेक्टर जीके सारस्वत ने तब विशेष रुचि लेकर अवैध कब्जे हटवाए थे।
आज 25 साल बाद यदि मुर्गा बकरा पार्टी के नाम पर मोहनपुर फिर से मतांतरण की गतिविधियों का केंद्र बनता जान पड़ रहा है तो ये सभी के लिए न केवल चिंता की बात है बल्कि मतांतरण के प्रयासों को रोकने के लिए व्यापक कार्ययोजना बनाने की जरूरत को भी दर्शाता है। एक ऐसी कार्ययोजना जो कागजों के स्थान पर धरातल पर परिणाममूलक साबित हो। इस कार्ययोजना में सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और सरकार सभी की भूमिका तय की जाए।
धर्मांतरण रोकना बेहद जरूरी है, क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपना हिंदू धर्म बदल कर मुस्लिम या ईसाई बन जाता है तब वह सिर्फ अपने विचार, मान्यताएं और भावनाएं ही नहीं बदलता। बल्कि धीरे धीरे वह देश की जड़ों से भी कटने लगता है। बाद में विदेशी ताकतों की कठपुतली भी बन सकता है। इसलिए धर्मांतरण को ही राष्ट्रांतरण कहते हैं।
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