सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पदाधिकारियों के इस्तीफे पर केंद्र से मांगा जवाब, कार्रवाई से बचने वालों के लाभ रोकने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के इस्तीफे के बाद मिलने वाले लाभों से जुड़े एक अहम मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में मांग की गई है कि यदि कोई संवैधानिक पदाधिकारी अपने खिलाफ हटाने की कार्रवाई या अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देता है, तो उसे उस पद से जुड़े सेवानिवृत्ति लाभ, भत्ते और अन्य सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल हैं। पीठ ने प्रातिक वीरा की ओर से दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि संवैधानिक पदाधिकारी के कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने के बावजूद यदि उसे पद से जुड़े लाभ मिलते रहते हैं, तो यह कानून के शासन की भावना के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ता ने जजों समेत सभी संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए ऐसी व्यवस्था की मांग की है, जिसमें कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले व्यक्ति को संबंधित पद के लाभ से वंचित किया जा सके।
जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला क्यों जुड़ा?
यह याचिका पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद और महत्वपूर्ण हो गई है। जस्टिस वर्मा का दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट तबादला किया गया था। 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में जली हुई करेंसी मिलने के बाद उनके खिलाफ जांच और हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।
लोकसभा में जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी थी, लेकिन उनके इस्तीफा देने के बाद यह प्रक्रिया निष्प्रभावी हो गई। याचिकाकर्ता ने इसी घटनाक्रम को आधार बनाते हुए सवाल उठाया है कि क्या कार्रवाई का सामना कर रहे किसी संवैधानिक पदाधिकारी को इस्तीफे के बाद भी संबंधित पद के वित्तीय और अन्य लाभ मिलते रहने चाहिए।
अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही और संभावित दिशा स्पष्ट होगी।
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