सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना मामला: शिंदे की सदस्यता पर जस्टिस बागची का बड़ा सवाल
महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़े शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं के सामने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि विधानसभा अध्यक्ष का एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य न ठहराने वाला फैसला रद्द कर दिया जाता है, तो क्या अदालत शिंदे को आज अयोग्य घोषित कर सकती है और क्या वह विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका निभा सकती है।
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को रद्द किए जाने की स्थिति में उसका उन विधायकों पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ेगा, जो बाद में चुनाव जीतकर दोबारा विधायक बन चुके हैं। विशेष रूप से एकनाथ शिंदे और अन्य विधायकों की मौजूदा सदस्यता पर इस फैसले के प्रभाव को लेकर संवैधानिक और कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है।
उद्धव ठाकरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने दलील दी कि यदि विधानसभा अध्यक्ष ने कानून और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के विपरीत फैसला दिया है, तो न्यायिक समीक्षा के तहत अदालत उस फैसले में हस्तक्षेप कर सकती है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलबदल से जुड़े घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि किसी गैर-कानूनी कार्रवाई को केवल समय बीत जाने के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने Subhash Desai मामले और Rajendra Singh Rana बनाम Swami Prasad Maurya जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का भी उल्लेख किया गया। इन मामलों के जरिए दलबदल विरोधी कानून और संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों तथा उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा के दायरे पर दलीलें रखी गईं।
शिवसेना से जुड़े इस मामले में संविधान की दसवीं अनुसूची, दलबदल विरोधी कानून और विधानसभा अध्यक्ष के फैसले की न्यायिक समीक्षा जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं। मामला Sunil Prabhu बनाम Eknath Shinde, SLP (C) No. 1644–1662/2024 और इससे जुड़े मामलों के तहत सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
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