SC/ST एक्ट के तहत आर्थिक सहायता पर हाईकोर्ट सख्त, अगली किस्त से पहले देना होगा शपथ पत्र
ग्वालियर (आरएनआई) मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि अब आर्थिक सहायता की अगली किस्त जारी करने से पहले पीड़ित को शपथ पत्र (एफिडेविट) देना अनिवार्य होगा।
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने यह आदेश एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज प्रकरण में चार्जशीट दाखिल होने के बाद पीड़िता को आर्थिक सहायता जारी करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि कई मामलों में मुआवजा मिलने के बाद पीड़ित पक्ष ट्रायल के दौरान अपने बयान बदल देता है या आरोपी से समझौता कर लेता है, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर हो जाता है।
अदालत ने निर्देश दिया कि आर्थिक सहायता की अगली किस्त प्राप्त करने से पहले पीड़ित को शपथ पत्र देना होगा कि वह मुकदमे के दौरान आरोपी से कोई समझौता नहीं करेगा और अपने बयान से भी नहीं मुकरेगा।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ट्रायल के दौरान पीड़ित अपने बयान से मुकरता है या आरोपों से पीछे हटता है, तो उसे सरकार से प्राप्त पूरी आर्थिक सहायता 30 दिनों के भीतर वापस करनी होगी। निर्धारित समय में राशि वापस नहीं करने पर सरकार नियमानुसार उसकी वसूली कर सकेगी।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट को भी यह स्वतंत्रता दी है कि यदि पीड़ित अपने बयान से मुकरता है, तो उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर वह आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
हाईकोर्ट के इस आदेश को एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता के दुरुपयोग पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सहायता का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना है, न कि मुकदमे के दौरान समझौता या बयान बदलने को बढ़ावा देना। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था आवश्यक है।
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