नए आपराधिक कानूनों की समीक्षा में जुटी केंद्र सरकार, जांच एजेंसियों से मांगे सुझाव; अरेस्ट मेमो के प्रावधानों पर उठे सवाल
नई दिल्ली।(आरएनआई)केंद्र सरकार नए आपराधिक कानूनों की समीक्षा की प्रक्रिया में जुट गई है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के लगभग दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर की जांच एजेंसियों और पुलिस विभागों से इन कानूनों के व्यावहारिक अनुभवों और सुधार संबंधी सुझाव मांगे गए हैं। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों की पुलिस इकाइयों ने अपने सुझाव केंद्र सरकार को भेजने शुरू कर दिए हैं।
गौरतलब है कि 1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) पूरे देश में लागू की गई थीं। इन कानूनों ने ब्रिटिश काल से लागू भारतीय दंड संहिता (IPC) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) का स्थान लिया था। अब इनके क्रियान्वयन के अनुभवों के आधार पर केंद्र सरकार समीक्षा कर रही है।
मुंबई पुलिस के कई अधिकारियों ने बताया कि उन्हें राज्य पुलिस मुख्यालय के माध्यम से सुझाव भेजने के निर्देश मिले थे। अधिकारियों के अनुसार नए कानूनों में कई सकारात्मक प्रावधान हैं, लेकिन कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आई हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा अरेस्ट मेमो से जुड़े प्रावधानों को लेकर हो रही है।
नए कानून के तहत किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद अरेस्ट मेमो तैयार करना अनिवार्य है। इसमें गिरफ्तारी की तारीख, समय, स्थान, गिरफ्तारी के कारण और गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी का पूरा विवरण दर्ज करना आवश्यक है। साथ ही आरोपी को उसकी समझ की भाषा में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप से उपलब्ध कराना भी अनिवार्य किया गया है। इसके अतिरिक्त आरोपी के हस्ताक्षर लेने के साथ किसी परिजन या स्थानीय सम्मानित व्यक्ति के हस्ताक्षर भी आवश्यक हैं।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इसी प्रावधान को लेकर हाल ही में नागपुर में एक हत्या के आरोपी को अदालत से जमानत मिल गई थी। यशोधरा नगर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तारी के कारण मराठी भाषा में उपलब्ध कराए थे, जबकि बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि आरोपी हिंदी भाषी है और उसे जानकारी हिंदी में दी जानी चाहिए थी। अदालत ने इस आधार पर गिरफ्तारी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोपी को राहत प्रदान की थी।
बाद में जांच अधिकारी ने आरोपी की शैक्षणिक जानकारी जुटाई और अदालत को उसकी दसवीं की मार्कशीट प्रस्तुत की, जिसमें वह मराठी विषय में उत्तीर्ण पाया गया था। पुलिस ने तर्क दिया कि आरोपी मराठी भाषा समझता है, इसलिए मराठी में अरेस्ट मेमो देना कानून के अनुरूप था। इसके बाद अदालत ने पुलिस को आरोपी की दोबारा हिरासत की अनुमति दे दी।
हालांकि इस मामले ने नए आपराधिक कानूनों में अरेस्ट मेमो और भाषा संबंधी प्रावधानों की व्यावहारिक चुनौतियों को उजागर कर दिया है। अब जांच एजेंसियों द्वारा भेजे गए सुझावों के आधार पर केंद्र सरकार इन प्रावधानों में आवश्यक संशोधन या स्पष्टीकरण पर विचार कर सकती है।
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