आदि शंकराचार्य और मां काली का प्रसंग: जब शक्ति के महत्व का हुआ साक्षात्कार
आदि शंकराचार्य और भगवती आद्याशक्ति मां काली से जुड़ा यह प्रसंग अद्वैत वेदांत और शक्ति तत्व के संबंध को समझाने वाली प्रसिद्ध धार्मिक कथा के रूप में बताया जाता है। मान्यता के अनुसार यह प्रसंग काशी की पवित्र भूमि से जुड़ा है।
आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के दर्शन को स्थापित करते हुए ब्रह्म को परम सत्य माना। उनका प्रसिद्ध सिद्धांत है- “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” अर्थात ब्रह्म ही सत्य है और जीव का वास्तविक स्वरूप ब्रह्म से अलग नहीं है। इसी ज्ञानमार्ग में वे निर्गुण और निराकार ब्रह्म की साधना पर विशेष जोर देते थे।
कथा के अनुसार, एक बार शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ काशी पहुंचे। उस दौरान वे अत्यधिक अस्वस्थ हो गए और उनका शरीर इतना कमजोर हो गया कि वे गंगा तट की सीढ़ियों पर बैठ गए। उनसे उठना भी मुश्किल हो रहा था। इसी दौरान वहां एक वृद्ध महिला पहुंचीं।
शंकराचार्य ने उनसे पानी देने का अनुरोध किया। वृद्ध महिला ने उनसे कहा कि यदि उन्हें पानी चाहिए तो वे स्वयं उठकर ले लें। शंकराचार्य ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि उनमें उठने की शक्ति ही नहीं है।

कहा जाता है कि वृद्ध महिला ने इसी बात के माध्यम से शंकराचार्य को शक्ति के महत्व का बोध कराया। उन्होंने सवाल किया कि यदि ब्रह्म ही सर्वस्व है और शक्ति का कोई स्वतंत्र महत्व नहीं है, तो बिना शक्ति के शरीर एक कदम भी क्यों नहीं उठा पा रहा है।
इस संवाद से शंकराचार्य को एहसास हुआ कि चेतना और उसकी क्रियाशील शक्ति को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। मान्यता है कि इसके बाद वृद्ध महिला ने अपना दिव्य स्वरूप प्रकट किया और शंकराचार्य को शक्ति तत्व का ज्ञान दिया।
इस प्रसंग का मूल संदेश यही माना जाता है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिस प्रकार अग्नि और उसकी ऊष्मा को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार चेतना और उसकी शक्ति भी अभिन्न हैं। शक्ति के बिना शिव को निष्क्रिय और निश्चेष्ट माना जाता है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से ‘शव’ कहा जाता है।
इसी भाव को ‘सौंदर्य लहरी’ के प्रसिद्ध प्रथम श्लोक में व्यक्त किया गया है-
“शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥”
इसका भावार्थ है कि शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि और अन्य क्रियाओं को संचालित करने में समर्थ होते हैं। शक्ति के बिना वे स्पंदन तक करने में सक्षम नहीं हैं।
हालांकि, इस पूरे प्रसंग को धार्मिक परंपरा और कथा के रूप में देखना चाहिए। ऐतिहासिक रूप से यह निश्चित रूप से प्रमाणित नहीं है कि काशी में शंकराचार्य के साथ ऐसी घटना हुई थी। ‘सौंदर्य लहरी’ की रचना और उसके शंकराचार्य से संबंध को लेकर भी विद्वानों के बीच अलग-अलग मत मिलते हैं।
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