मथुरा में बसपा का हाथी सुस्त या सियासी रणनीति में व्यस्त? मजबूत वोट बैंक के बीच टिकट को लेकर दावेदारों में बेचैनी
गोपाल चतुर्वेदी
मथुरा। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ मथुरा की पांचों विधानसभा सीटों पर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। भाजपा, सपा, रालोद और कांग्रेस में संभावित दावेदार अपने-अपने स्तर पर जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी को लेकर स्थानीय राजनीतिक गलियारों में अलग तरह की चर्चा है। पार्टी के पास जिले में अब भी एक मजबूत मतदाता आधार माना जाता है, लेकिन संभावित प्रत्याशियों के बीच टिकट को लेकर असमंजस और अंतिम फैसले का इंतजार चर्चा का विषय बना हुआ है।
मथुरा में बसपा की राजनीतिक ताकत को आंकड़ों के लिहाज से नजरअंदाज करना आसान नहीं है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने जिले की पांचों सीटों पर कुल करीब 2.42 लाख वोट हासिल किए थे। मथुरा और गोवर्धन विधानसभा सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। इससे पहले 2007 में बसपा को करीब 1.61 लाख, 2012 में 2.54 लाख और 2017 में लगभग 2.52 लाख वोट मिले थे। 2022 में भी पार्टी का वोट आधार करीब 2.42 लाख रहा।
इन आंकड़ों से साफ है कि बसपा के पास मथुरा में अपना एक स्थायी मतदाता आधार मौजूद है। हालांकि, इस वोट बैंक को विधानसभा सीट में बदलने के लिए मजबूत प्रत्याशी, सक्रिय संगठन और प्रभावी चुनावी रणनीति की जरूरत होगी। यही वजह है कि टिकट को लेकर पार्टी के संभावित उम्मीदवारों की नजर अब नेतृत्व के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।
2024 के लोकसभा चुनाव का घटनाक्रम भी स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में बार-बार सामने आ रहा है। मथुरा लोकसभा सीट से बसपा ने पहले कमलकांत उपमन्यु को प्रत्याशी घोषित किया था। पार्टी के बड़े नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके नाम की घोषणा भी की गई थी, लेकिन अगले ही दिन प्रत्याशी बदलकर सुरेश सिंह को मैदान में उतार दिया गया। प्रत्याशी बदलने की यह घटना उस समय राजनीतिक चर्चा का विषय बनी थी।
अब विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यही घटनाक्रम संभावित दावेदारों के बीच एक सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या पार्टी की ओर से किसी नाम पर शुरुआती सहमति के बाद भी अंतिम समय तक बदलाव की गुंजाइश रहती है। हालांकि, विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर मथुरा में किसी घोषित प्रत्याशी का टिकट बदले जाने की फिलहाल कोई आधिकारिक घटना सामने नहीं आई है। इसलिए यह चर्चा अभी राजनीतिक आशंका और स्थानीय चर्चाओं तक ही सीमित है।
मथुरा विधानसभा सीट की बात करें तो 2022 में बसपा प्रत्याशी को 31,551 वोट मिले थे। वर्ष 2017 में भी पार्टी को 31,168 वोट हासिल हुए थे। लगातार दो चुनावों में करीब 31 हजार वोटों का आधार यह संकेत देता है कि पार्टी का यहां अपना मतदाता वर्ग मौजूद है। चुनौती अब इस आधार को और मजबूत करने तथा उसे जीत के आंकड़े तक पहुंचाने की है।
दावेदारों के बीच बेचैनी की एक वजह यही है कि चुनावी तैयारी में समय और संसाधन दोनों लगते हैं। संभावित प्रत्याशी क्षेत्र में संपर्क बढ़ाते हैं, समर्थकों को सक्रिय करते हैं और संगठन के स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से वे यह जानना चाहते हैं कि पार्टी नेतृत्व उनके नाम को लेकर कितनी गंभीरता से विचार कर रहा है और अंतिम निर्णय कब तक स्पष्ट होगा।
मथुरा में बसपा के सामने चुनौती बड़ी जरूर है, लेकिन अवसर भी कम नहीं हैं। जिले में पार्टी का लगातार बना हुआ वोट आधार उसे चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में रखता है। वर्ष 2022 में मथुरा और गोवर्धन सीट पर दूसरे स्थान पर रहना भी बताता है कि पार्टी कई सीटों पर मुकाबले को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि बसपा आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपने संगठन को किस तरह सक्रिय करती है और प्रत्याशी चयन में किन चेहरों पर भरोसा जताती है। चुनावी राजनीति में केवल वोट बैंक काफी नहीं होता, उसे मजबूत नेतृत्व, सक्रिय संगठन और समय पर लिए गए रणनीतिक फैसलों की जरूरत होती है।
मथुरा की सियासत में फिलहाल बसपा के ‘हाथी’ की चाल को लेकर चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन उसके वोट आधार को देखते हुए उसे नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा। असली सवाल यही है कि इस बार हाथी की चाल कितनी तेज होगी और उसकी दिशा तय करने की जिम्मेदारी पार्टी किस चेहरे को सौंपेगी।
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