बार काउंसिल की शक्ति बनाम कानून की सीमा, हाईकोर्ट के आदेश ने उठाया बड़ा सवाल
सत्येंद्र नाथ श्रीवास्तव
लखनऊ। बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश अधिवक्ताओं के अनुशासन और पेशेवर आचरण को नियंत्रित करने वाली वैधानिक संस्था है, लेकिन उसकी शक्तियां भी कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही हैं। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और महामंत्री अवनीश दीक्षित से जुड़े मामले में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के 26 सितंबर 2026 के आदेश को निरस्त कर दिया।
बार काउंसिल ने दोनों अधिवक्ताओं के नामांकन और प्रैक्टिस पर ‘अगले आदेश तक’ रोक लगा दी थी। मामले में मुख्य सवाल यह था कि यदि किसी अधिवक्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच चल रही हो, तो क्या जांच पूरी होने से पहले उसे अनिश्चितकाल के लिए प्रैक्टिस से निलंबित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35(3) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत निलंबन एक निर्धारित दंड है। लंबित अनुशासनात्मक जांच के दौरान ‘अगले आदेश तक’ के रूप में अंतरिम निलंबन का आदेश पारित करने की शक्ति बार काउंसिल को प्राप्त नहीं है। इसी आधार पर 26 सितंबर को जारी किया गया आदेश निरस्त कर दिया गया।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि दोनों अधिवक्ताओं के खिलाफ पूरी अनुशासनात्मक कार्यवाही समाप्त हो गई है। हाईकोर्ट ने दोनों को 11 अक्टूबर 2026 को अनुशासनात्मक प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया है। यानी जांच और अनुशासनात्मक कार्यवाही कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आगे जारी रह सकती है।
इस फैसले के बाद बार काउंसिल की वैधानिक शक्तियों और उनकी सीमाओं को लेकर सवाल उठ खड़ा हुआ है। अधिवक्ताओं के खिलाफ शिकायत होने पर जांच करना और आरोप सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करना बार काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन किसी ऐसी शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता जिसका स्पष्ट प्रावधान कानून में मौजूद न हो।
मामले का मूल सवाल किसी व्यक्ति विशेष की जीत या हार से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह है कि क्या कोई वैधानिक संस्था कानून से ऊपर हो सकती है। बार काउंसिल अधिवक्ताओं की नियामक संस्था है, लेकिन उसकी कार्रवाई भी उसी कानून के अधीन है जिसके पालन की अपेक्षा वह अधिवक्ताओं से करती है।
अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन की कार्रवाई भी कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिए। अधिकार, प्रक्रिया और वैधानिक सीमा के बीच संतुलन ही कानून के शासन की मूल भावना है।
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